13/05/2026
सुना है आईपीएल की टीआरपी में भारी गिरावट आई है। टीआरपी में गिरावट का आना इस बात का सुबूत है कि इस लीग की लोकप्रियता बहुत तेजी से कम हो रही है। अगर टीआरपी वाला लफड़ा किनारे पर कर दिया जाए और इस मामले में न पड़ा जाए कि यह सही है या गलत और सिर्फ एक आम क्रिकेट फैन की नजर से खुद ही महसूस करें तो मामला साफ हो जाता है कि आईपीएल में अब वो पहले वाली बात नही रही।
यह गिरावट क्यों आई है और लोगों की दिलचस्पी आईपीएल से कम क्यों हो रही है अगर इसकी तह तक जाने की कोशिश की जाए तो पानी की तरह सभी चीजें एक एक करके साफ हो जाएंगी। वास्तव में आईपीएल एक ग्लोबल स्तर की टी20 लीग है जिसमें दुनिया के सभी देशों के क्रिकेट खिलाड़ी खेलते हैं। बीसीसीआई द्वारा कुछ देशों के खिलाड़ियों को सीधे तौर पर आईपीएल खेलने से मना कर देना भी इस प्रतिष्ठित टी20 लीग के पतन का एक कारण हो सकता है।
आईपीएल के पतन का जो सबसे अहम कारण लग रहा है वह है हर बार की तरह अचानक ही किसी अजेय टीम का हारने लगना और लगातार हार से परेशान किसी टीम का अचानक ही लगातार जीतने लगना। इस आईपीएल सीजन ही नहीं पिछले सीजन भी यही कहानी हुई थी। अचानक ही वो टीम जो पॉइंट टेबल में टॉप पर रहती है वो हारने लगती है और प्वाइंट टेबल में नीचे रह रही टीम अचानक ही जीतने लगती है।
पंजाब किंग्स,गुजरात टाइटंस और कोलकाता नाइट राइडर्स यह ऐसी टीमें हैं जिनके प्रदर्शन यह साबित करते हैं कि दाल में कुछ तो काला जरूर है। पंजाब किंग्स और गुजरात टाइटंस टीम की अगर तुलना की जाए तो पंजाब किंग्स के सामने गुजरात टाइटंस की टीम बल्लेबाजी के मामले में बिल्कुल भी नही टिकती। अगर पंजाब किंग्स ने इस साल बल्लेबाजी में मोटा माटी ढाई सौ के लगभग छक्के जड़े होंगे तो गुजरात टाइटंस की पूरी टीम इस सीजन अभी तक सौ छक्के भी नहीं लगा सकी होगी।
गुजरात टाइटंस और पंजाब किंग्स की टीम दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। दोनों इस साल अपने अभी तक 11-11 मैच खेल चुके हैं। गुजरात टाइटंस टीम ने इनमें से 7 मैचों में दर्ज की है। पंजाब किंग्स की टीम अभी तक केवल 6 मैच जीत सकी है और वो भी लगातार जीती थी। यह सोचकर भी सिर घूम जाता है कि गुजरात टाइटंस की टीम जिसने पूरे सीजन 100 छक्के भी नहीं लगाए हों वो टीम पंजाब किंग्स से ज्यादा मैच जीत चुकी है जिसने ढाई सौ के करीब छक्के जड़े हैं।
सवाल यह है कि क्या पंजाब किंग्स लगातार 6 मैच जीतने के बाद अचानक ही इतनी खराब टीम हो गई कि लगातार 4 मैच हार गई? क्या गुजरात टाइटंस इतनी मजबूत टीम नजर आती है कि वो लगातार 4 मैच जीत जाए और प्वाइंट टेबल में पंजाब किंग्स से आगे खड़ी हो? क्या श्रेयस अय्यर कप्तानी के मामले में शुभमन गिल से पीछे हैं? सबका जवाब ढूंढा जाना चाहिए। सच सामने आना चाहिए।
ऐसी ही कहानी कोलकाता नाइट राइडर्स की भी है। वो कोलकाता नाइट राइडर्स जो शुरू में तो लगातार 5 मैच हार चुकी थी और लग रहा था बहुत खराब टीम है वो अचानक ही अजेय नजर आने लगी है। कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम लगातार 4 मैच जीत चुकी है। सवाल है कि कोलकाता नाइट राइडर्स ने अचानक ही क्या डोज ले ली कि अजेय नजर आने लगी?
चेन्नई सुपर किंग्स शुरू में हारी तो अब अजेय नजर आने लगी है। वो अजिंक्य रहाणे जो शुरू में खराब कप्तान नजर आ रहे थे अचानक ही बहुत अच्छे कप्तान नजर आने लगे। ऋतुराज गायकवाड़ जिनको लोग क्या नहीं कह रहे थे अचानक ही सुपर कप्तान साबित होने लगे। श्रेयस अय्यर जो शुरू में अजेय कप्तान बने थे अचानक औसत कप्तान नजर आने लगे।
यहां लगता है सच है कि यह आईपीएल है और यहां क्या हो जाए कुछ नही पता। यहां न तो कोई कप्तान अच्छा है और न ही कोई कप्तान खराब। न कोई टीम अच्छी है और न ही कोई टीम खराब है। शुरु में चाहे जो जीते लेकिन अंत में प्लेऑफ के लिए रोमांच बनाए रखने के लिए वही टीम जीतती है जिसके जीतने से प्लेऑफ की रेस में रोमांच बना रहे। यही कारण है कि अब सबको पहले से ही अहसास हो जाता है कि क्या हो सकता है। आईपीएल की टीआरपी भी हो सकता है इसी वजह से गिर रही हो।
30/04/2026
आईपीएल के एक सीजन में सबसे ज्यादा छक्कों का रिकॉर्ड आज भी यूनिवर्स बॉस 'क्रिस गेल' के नाम है। साल 2012 में उन्होंने 59 छक्के लगाए थे, यानी 14 साल पुराना रिकॉर्ड आज भी कायम है लेकिन अब 2026 में ये रिकॉर्ड 15 साल का लड़का तोड़ सकता है। जी हाँ, सही समझे वैभव सूर्यवंशी, आधे सीजन में ही 37 छक्के ठोक चुका है। अगर यही रफ्तार रही, तो इस साल वो रिकॉर्ड टूट सकता है। और अगर ऐसा हुआ, तो ये सिर्फ रिकॉर्ड टूटना नहीं होगा, बल्कि इतिहास लिखा जाएगा- 14 साल पुराना रिकॉर्ड, एक 15 साल के लड़के ने तोड़ा!
सिर्फ छक्के ही नहीं, रन बनाने की रफ्तार भी हैरान कर देने वाली है। महज 167 गेंदों में 400 रन ठोक दिए हैं। ये आंकड़े नहीं, एक घोषणा है- एक तूफान के आने की। दुनिया भर के इंटरनेशनल खिलाड़ी भी हैरान हैं कि कोई इतनी तेज बल्लेबाजी लगातार मैचों में कैसे कर सकता है।
अब सवाल है कि ये कहाँ तक जाएगा? आईपीएल के बाद टीम इंडिया में उसका चयन लगभग तय माना जा रहा है और अगर ऐसा होता है, तो ये सिर्फ एक खिलाड़ी का नहीं, एक नए युग (सूर्यवंशी) का आगाज़ होगा। ~गोविंद परिहार 🙏
27/04/2026
लखनऊ सुपर जायंट्स के महान रणनीतिकार कोच और जीनियस कप्तान को मेरा साष्टांग दंडवत प्रणाम! सच कहूं तो, ईश्वर क्रिकेट के ऐसे अद्भुत बुद्धि वाले चाणक्य किसी दुश्मन टीम को भी न दे।
जरा इतिहास के पन्नों पर जमी धूल हटाकर देखिए। पूरी दुनिया जानती है कि टी20 क्रिकेट के इतिहास में आज तक सिर्फ एक ही बार सुपर ओवर मेडेन गया है। यह चमत्कार सुनील नरेन ने किया था और उस वक्त सामने स्ट्राइक पर कौन था? यही निकोलस पूरन! और मजे की बात यह है कि उस दौर में पूरन अपने करियर के सबसे खौफनाक और प्राइम फॉर्म में हुआ करते थे।
अब जरा कल रात के ड्रामे पर आते हैं। आज के हालात में जब निकोलस पूरन का बल्ला बुरी तरह रूठा हुआ है और गेंद उनके बल्ले के बीचों-बीच आ ही नहीं रही, तब भी लखनऊ के इस महान थिंक-टैंक ने उन्हें उसी सुनील नरेन की जादुई फिरकी के सामने सुपर ओवर में बलि का बकरा बनाकर भेज दिया। नतीजा वही हुआ जिसकी पूरी दुनिया को उम्मीद थी पहली ही गेंद पर पूरन चारो खाने चित और क्लीन बोल्ड! इसके बाद तीसरी गेंद पर एडेन मार्करम भी अपना विकेट फेंक कर चलते बने।
लेकिन इस पूरी कॉमेडी ऑफ एरर्स की हद तो तब हो गई, जब टीम मैनेजमेंट की इस बचकानी रणनीति का अगला नमूना देखने को मिला। विकेट गिरने के बाद खुद कप्तान ऋषभ पंत क्रीज पर चले आए, जबकि डगआउट में टीम का सबसे खूंखार, सबसे बड़ा हिटर और शानदार फॉर्म में चल रहा मिचेल मार्श सिर्फ बैठकर ताली बजाने के लिए छोड़ दिया गया। इंटरनेशनल क्रिकेट के इतने बड़े मंच पर ऐसी गली क्रिकेट वाली रणनीति मैंने अपनी जिंदगी में आज तक नहीं देखी!
सबसे ज्यादा अफसोस और दिल टूटने वाली बात तो मोहम्मद शमी की उस ऐतिहासिक कोशिश का यूं बर्बाद होना है। असली मैच की आखिरी रोमांचक गेंद पर शमी ने वो जादुई छक्का जड़कर न सिर्फ हार के जबड़े से मैच छीना था, बल्कि सुपर ओवर का एक सुनहरा और मोमेंटम से भरा मंच तैयार किया था। लेकिन इन महान रणनीतिकारों की घटिया और डरपोक सोच ने उस पूरी मेहनत पर एक ही झटके में पानी फेर दिया। वाकई, कई बार आप सामने वाली टीम की ताकत से नहीं, बल्कि अपनी ही टीम की बेवकूफी से मैच हारते हैं!
19/04/2026
"कालू है ना सब संभाल लेगा"
सचिन तेंदुलकर मुम्बई शहर में ही किसी टीम के लिये लोकल मैच खेलने के लिये गये थे और उस समय सचिन की उम्र लगभग 13 साल थी तो सामने वाली टीम के प्लेयर घबरा रहे थे की उस टीम में तो "तेंदुलया" है। तो विपक्षी टीम के कैप्टेन ने अपने प्लेयरों से कहा घबराने की कोई बात नहीं है अगर उनके पास तेंदुलया है तो अपने पास कालू है।
ये तेंदुलया लोग तेंदुलकर को प्यार से कहते थे और कालू विनोद कांबली को। तेंदुलया और कालू का बचपन से ही पूरे मुम्बई की क्रिकेट में सिक्का चलता था।
फिर ऐसा क्या हुआ कि मुम्बई की गलियों वाला तेंदुलया गॉड ऑफ क्रिकेट बन गया और कालू आज दर दर की ठोकरें खा रहा है। जिसकी यादाश्त तक चली गयी है। जिसके पास ढंग से इलाज करवाने तक के पैसे नहीं है। कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि कांबली के पास ढंग से खाना खाने के पैसे भी नहीं है।
बात शुरुआत से करते हैं, विनोद कांबली का जन्म मुम्बई की एक गली में बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था, उनके पिता एक मकेनिक थे और वो क्लब क्रिकेट खेलते थे तो कांबली ने भी बचपन से बल्ला थाम लिया। आर्थिक स्तिथि बहुत अच्छी ना होने के बावजूद कांबली के पिता ने उनके टैलेंट को देखते हुए उन्हें गुरु रमाकांत आचरेकार के पास ले गये, जहाँ पर सचिन तेंदुलकर और प्रवीण आमरे पहले से ही क्रिकेट की बारीकीयाँ सीख रहे थे। कहते हैं उन तीनों खिलाड़ियों के टैलेंट को देखते हुए उनके गुरु ने उसी टाइम कह दिया था कि ये तीनों एक दिन इंडिया के लिये खेलेंगे। और उनकी बात सच भी साबित हुई।
हैरिस शील्ड का एक मैच चल रहा था, सचिन और कांबली ने लगभग 700 रन की साझेदारी कर दी और दोनों बैटिंग में इतना खो गये कि उनके कोच रमाकांत आचरेकार पारी घोषित करने के लिये कह रहे थे और उनको पता ही नहीं चला। बाद में कोच ने उन दोनों को बुलाकर खूब डांट लगायी। लेकिन उस मैच के बाद रातों रात वो दोनों मुम्बई क्रिकेट के सुपरस्टार बन गये थे।
उन दोनों का सफर चलता रहा जहाँ सचिन को मात्र 16 साल की उम्र में इंडिया के लिये खेलने का मौका मिला वहीं कांबली को एक दो साल बाद मौका मिला।
मैं उस समय क्लास 6था में था जब विनोद कांबली को इंडिया के लिये खेलने का मौका मिला। विनोद कांबली जो आये तो छाते ही चले गये। अपने कैरियर की इतनी जबरदस्त शुरुआत की कि शुरुआती 7 मैचों में ही 793 रन बना दिये। सचिन तेंदुलकर भी उनके आगे फीके लगने लगे। अपने तीसरे और चौथे टेस्ट में लगातार 2 दोहरे शतक बना दिये। सारे क्रिकेट जगत में सिर्फ एक ही नाम की चर्चा थी। लोगों ने कहना शुरू कर दिया वर्ल्ड क्रिकेट का ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं होगा जो कांबली के नाम नहीं होगा। ये बात सच भी है कांबली में वो बात थी लोगों का सोचना गलत भी नहीं था।
कुछ क्रिकेट पंडितों ने तो विनोद कांबली को सचिन तेंदुलकर से भी ज्यादा टैलेंटेड बताना शुरू कर दिया। आज मैं भी अपने मन का पाप बताता हूँ उस समय मेरे दिल के भी किसी कोने से यहीं आवाज आनी शुरू हो गयी थी कि विनोद कांबली सचिन तेंदुलकर से बेहतर है।
जब विनोद कांबली इतने टैलेंटेड प्लेयर थे और उनके कैरियर की इतनी जबरदस्त शुरुआत भी हो गयी थी तो विनोद कांबली इतनी गुमनामी में कैसे चले गये कि आज उनकी ये कंडीशन है।
सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली की बैटिंग में भले ही ज्यादा फर्क ना रहा हो लेकिन उनके संस्कार, व्यवहार, और परवरिश में जमीन आसमान का फर्क था। जिसकी वजह से आज सचिन कहाँ हैं और विनोद कांबली कहाँ हैं।
रातों रात मिली दौलत और शोहरत को विनोद कांबली संभाल नहीं पाये, कामयाबी उनके सिर पर सवार हो गयी। रात रात भर क्लब में जाना पार्टी करना, अनलिमिटेड सिगरेट और शराब पीना उनकी दिनचर्या बन गयी। लेट रात तक पार्टी करने के बाद आना और प्रैक्टिस में भी ना जाने से उनका क्रिकेट प्रभावित होने लगा उनकी फिटनेस भी धीरे धीरे बेकार होती गयी। कई बार उनके ऊपर अनुशासनात्मक कार्यवाही भी हुई लेकिन वो नहीं सुधरे। और उन्होंने अपने आपको क्रिकेट से बड़ा समझने की भूल कर दी। धीरे धीरे उनकी फॉर्म में गिरावट आती गयी जिससे उनको इंडियन टीम में अपने प्लेस से भी हाथ धोना पड़ा।
कहते हैं जो समय के साथ नहीं चलता उसको ताउम्र ठोकर ही लगती है, विनोद कांबली के साथ भी ऐसा ही हुआ। कई बार उनकी टीम में वापसी हुई लेकिन वो अपना प्राइम खो चुके थे। और उस तरह से परफॉर्म नहीं कर पाये जैसी उनसे अपेक्षा थी। उस दौर में सौरभ गाँगुली और राहुल द्रविड़ का उदय हो चुका था जिससे विनोद कांबली के कैरियर पर हमेशा के लिये विराम लग गया।
इंडियन क्रिकेट में कभी ध्रुव तारे की तरह चमकने वाला सितारा आज गुमनामी में कहीं खो गया।
क्रिकेट में सब कुछ खत्म होने के बाद विनोद कांबली ने राजनीति और फिल्म में भी हाथ आजमाया लेकिन अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली। शायद विनोद कांबली उन चीजों के लिये बना ही नहीं था। वो बना तो क्रिकेट की दुनिया पर राज करने के लिये लेकिन वक्त और हालत ने ऐसी करवट बदली कि वो फिर कभी संभल नहीं पाये ।
हर तरफ नाकामयाबी के बाद आर्थिक तंगी और बीमारियों ने चारों तरफ से घेर लिया। लोगों ने उनको सिगरेट मांग मांगकर पीते हुए देखा। लोग कहते हैं उनके दोस्त सचिन ने बहुत सारे मौकों पर पैसे की मदद की। लेकिन कोई कितनी मदद कर सकता है। हताश और निराश विनोद कांबली को लोगों ने लाइव न्यूज़ चैनल पर रोते भी देखा है। BCCI ने भी उनके इलाज के लिये कुछ मदद की थी। कुछ सीनियर खिलाड़ियों ने भी विनोद कांबली के लिये आवाज उठायी थी।
आज विनोद कांबली की इस दुर्दशा को देखकर रोना आता है क्यूँकि हम वो लोग हैं जिन्होंने इनको पहले मैच से लेकर आखिरी मैच तक खेलते हुए देखा है और महसूस किया है कि विनोद कांबली कितना बड़ा प्लेयर था।
एक कहावत है "शाशन वही पाता है जिसके अंदर अनुशासन हो"। ये कहावत विनोद कांबली और सचिन तेंदुलकर पर बिलकुल सटीक बैठती है। उसी अनुशासन की वजह से सचिन आज कहाँ हैं और विनोद कांबली कहाँ हैं।
अगर आपकी भी कोई विनोद कांबली को लेकर कोई मेमोरी है तो बतायें और अगर आपको ये स्टोरी पसंद आयी हो तो प्लीज शेयर करें।
😭🏏🇮🇳
14/04/2026
"अंधेरा हो चुका था, दिख कुछ नहीं रहा था!" लेकिन उस एक चौके ने पाकिस्तान का घमंड तोड़ दिया! हृषिकेश कानिटकर: वो गुमनाम हीरो जिसने भारत को वर्ल्ड रिकॉर्ड जीता उभर! (1998)
1998 में वनडे क्रिकेट में 315 रन चेज़ (Chase) करना वैसा ही था जैसे आज के राउंड में 450 रन चेज़ करना। नामुमकिन!
इंडिपेंडेंस कप का फाइनल (तीसरा फाइनल)। ढाका।
साइड अनवर (140) और एजाज अहमद (117) ने भारतीय गेंदबाजों की धज्जियां उड़ा दी थीं। पाकिस्तान ने 314 रन बनाए।
दादा और रॉबिन की लड़ाई:
सबको लगा भारत हार गया।
लेकिन सौरव गांगुली (124) और रॉबिन सिंह (82) ने हार नहीं मानी। उन्होंने अद्भुत साझेदारी की।
लेकिन जैसे ही ये दोनों आउट हुए, भारतीय टीम फिर लड़खड़ा गई।
मैच आखिरी ओवर तक गया। मैदान पर घुप अंधेरा (Bad Light) हो चुका था। अंपायरों ने खेल नहीं रोका। गेंद देखना मुश्किल हो रहा था।
वो 2 गेंदे, 3 रन:
आखिरी ओवर पाकिस्तान के जादूगर स्पिनर सकलैन मुश्ताक कर रहे थे।
इक्वालेशन: 2 गेंदे, 3 रन।
क्रीज पर थे एक नए और युवा बाएं हाथ के बैट्समैन—हृषिकेश कानिटकर (Hrishikesh Kanitkar)।
प्रेशर ऐसा था कि सांसें रुकी हुई थीं। करोड़ों भारतीय टीवी से जुड़ते थे और दुआ मांग रहे थे—"बस आउट मत होना!"
कानिटकर का हिस्टोरिक चौका:
सकलैन ने गेंद फेंकी।
कानिटकर ने अपना पैर आगे निकाला और मिड-विकेट (Mid-wicket) की तरफ एक करारा शॉट मारा।
बॉल बाउंड्री के पार! चौका!
कानिटकर ने हवा में बल्ला और हेलमेट लहरया। यह सिर्फ एक जीत नहीं थी, यह वर्ल्ड रिकॉर्ड चेज़ (World Record Chase) था।
उस चौके ने 1986 के मियांदाद वाले कंधों का दर्द काफी हद तक कम कर दिया था।
वन-मैच वंडर:
मजे की बात यह है कि कानिटकर का करियर ज्यादा लंबा नहीं चला, लेकिन उस एक चौके ने उन्हें भारतीय क्रिकेट इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया। जब भी भारत-पाक रोमांचक मैचों की बात होती है, कानिटकर का नाम सबसे पहले आता है।
द वर्ल्ड रिकॉर्ड चेज़:
मैच: इंडिपेंडेंस कप फाइनल, ढाका (1998).
लक्ष्य: 315 रन का पीछा किया (उस समय एक वर्ल्ड रिकॉर्ड).
चुनौती: आखिरी ओवरों में बहुत खराब रोशनी में खेला।
हीरो: सौरव गांगुली (124) ने इसे सेट किया, कानिटकर ने इसे खत्म किया।
शॉट: सकलैन मुश्ताक की दूसरी गेंद पर एक बाउंड्री।
बदला: पाकिस्तान के खिलाफ पिछली दिल तोड़ने वाली हार का बदला लिया।
क्या आपको वो पल याद है जब कानिटकर ने चौका मारा था?
#ऋषिकेश कानितकर #भारत बनाम पाक #ढाका1998 #स्वतंत्रता कप #विश्व रिकॉर्ड पीछा #सौरव गांगुली #क्रिकेट इतिहास #पुरानी यादें #ब्लीडब्लू
11/04/2026
वो गेंद जिसने न्यूटन के नियमों को मज़ाक बना दिया! 'बॉल ऑफ द सेंचुरी' का असली सच!क्रिकेट में लाखों गेंदे फेंकी गई हैं, लेकिन 4 जून 1993 को मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड मैदान पर जो हुआ, वैसा न पहले कभी हुआ था, न शायद कभी होगा।
गेंदबाज: 23 साल का एक मोटा-ताजा ऑस्ट्रेलियाई, शेन वॉर्न (Shane Warne)।
बल्लेबाज: इंग्लैंड के दिग्गज और स्पिन खेलने में माहिर, माइक गैटिंग।
यह एशेज सीरीज़ में वॉर्न की पहली ही गेंद थी।
वॉर्न ने लेग स्टंप के काफी बाहर गेंद फेंकी।
माइक गैटिंग ने सोचा—"यह तो वाइड जाएगी या लेग साइड पर सीधे पैड्स पर लगेगी।" उन्होंने अपना बल्ला हटा लिया और गेंद को जाने दिया।
लेकिन तभी जादू हुआ!
गेंद हवा में तैरी, पिच पर टप्पा खाया, और लेग स्टंप के बाहर से लगभग 90 डिग्री घूमकर गैटिंग के ऑफ स्टंप की गिल्लियां उड़ा ले गई!
माइक गैटिंग को विश्वास ही नहीं हुआ। वह पिच पर खड़े होकर अंपायर को ऐसे देख रहे थे मानो पूछ रहे हों—"क्या हुआ? क्या मैं आउट हूँ?"
गैटिंग का वो हैरान चेहरा (Shocked Face) क्रिकेट इतिहास की सबसे मशहूर तस्वीरों में से एक बन गया।
कमेंटेटर रिची बेनो ने बस इतना कहा:
"Gatting has absolutely no idea what has happened to him."
उस एक गेंद ने लेग स्पिन को 'विलुप्त' होने से बचा लिया और शेन वॉर्न को रातों-रात सुपरस्टार बना दिया। इसे ही "Ball of the Century" (शताब्दी की सर्वश्रेष्ठ गेंद) कहा गया।
विज्ञान के नियम कहते हैं कि गेंद इतना नहीं घूम सकती, लेकिन शेन वॉर्न ने उस दिन विज्ञान को हरा दिया था।
द मैजिक बॉल:
तारीख: 4 जून 1993
जगह: ओल्ड ट्रैफर्ड, इंग्लैंड
टर्न: लेग स्टंप के बाहर से ऑफ स्टंप तक।
परिणाम: माइक गैटिंग बोल्ड।
क्या आपने उस गेंद का वीडियो देखा है? क्या आपको लगता है कि आज के दौर में DRS होता तो गैटिंग बच जाते? (शायद नहीं, क्योंकि वह क्लीन बोल्ड थे!
09/04/2026
पहले मैच में 52(17) रन।
दूसरे मैच में 31(18) रन।
तीसरे मैच में 39(14) रन।
अगर इसी प्रकार से खेलते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब आप भारतीय टीम के टी20 squad में देखेंगे
05/04/2026
"कर्टली किसी से बात नहीं करता!"... वो 6'7" का लंबा साया जिसने 1 रन देकर 7 विकेट ले लिया!! क्रिकेट इतिहास में शोएब अख्तर या ब्रेट ली शोर मचाते थे, लेकिन कर्टली एम्ब्रोस "सन्नाटा" (Silence) थे।
वो कभी स्लेजिंग (Sledging) नहीं करते थे।
उन्हें इसकी जरूरत ही नहीं थी।
वो बस बल्लेबाज को घूरते (The Stare) थे।
उनकी वो जलती हुई आँखें और 6 फीट 7 इंच की ऊंचाई से आती हुई गेंद... बल्लेबाज को लगता था कि वो किसी बिल्डिंग से कूदने वाला है।
1. पर्थ का कत्लेआम (7 wickets for 1 run):
1993, पर्थ (WACA) की तेज पिच। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ।
वेस्टइंडीज सीरीज हारने की कगार पर था।
फिर लंच के बाद कर्टली एम्ब्रोस आए।
उन्होंने 32 गेंदों का एक ऐसा स्पेल डाला जो इतिहास बन गया।
* रन: 1
* विकेट: 7
ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज आए और गए। एलन बॉर्डर जैसा कप्तान भी समझ नहीं पाया कि हो क्या रहा है। वेस्टइंडीज ने वह मैच पारी से जीता। यह तेज गेंदबाजी का अब तक का सबसे खतरनाक स्पेल माना जाता है।
2. "कर्टली किसी से बात नहीं करता" (The Attitude):
एक पत्रकार ने उनसे इंटरव्यू मांगा।
एम्ब्रोस ने उसे सिर्फ एक लाइन कही—"Curtly talks to no one." (कर्टली किसी से बात नहीं करता)।
यह लाइन उनकी पहचान बन गई।
वो मैदान पर अपनी टीम के साथियों से भी हाई-फाइव (High-five) बहुत मुश्किल से करते थे। उनका काम था—विकेट लेना और वापस जाना।
3. डीन जोन्स और रिस्ट-बैंड (Don't Poke the Bear):
एक मैच में ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज डीन जोन्स ने एम्ब्रोस से अंपायर के जरिए कहा—"कृपया अपने हाथों से वो सफेद रिस्ट-बैंड (Wristbands) हटा लें, मुझे गेंद देखने में दिक्कत हो रही है।"
यह शेर को जगाने जैसा था।
एम्ब्रोस को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने बैंड हटाए, और फिर अगली ही गेंदों पर डीन जोन्स और पूरी ऑस्ट्रेलियाई टीम को उखाड़ फेंका!
जोन्स ने बाद में माना—"मैंने उन्हें गुस्सा दिलाकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली थी।"
4. 405 विकेट और 20 का औसत:
उनके आंकड़े डरावने हैं।
405 टेस्ट विकेट, और औसत सिर्फ 20.99!
आधुनिक युग में 400 से ज्यादा विकेट लेने वाले किसी भी गेंदबाज का औसत इतना कम नहीं है (मैक्ग्रा और हैडली के अलावा)।
वो और कर्टनी वॉल्श 90 के दशक में दुनिया की सबसे खतरनाक जोड़ी थे।
क्या आपको लगता है कि कर्टली एम्ब्रोस की "ऊंचाई" (Height) और "बाउंस" (Bounce) का सामना करना किसी भी बल्लेबाज के लिए सबसे कठिन परीक्षा थी?
04/04/2026
आप लोगो ने नोटिस किया हो तो चेन्नई सुपर किंग से जाने के बाद ये खिलाड़ी और भी बेहतरीन नजर आ रहे हैं (समीर,देशपांड्ये)और जड्डू तो बहुत गुस्से में है ऐसा लगता है जैसे इंतज़ार ही कर रहा था राजस्थान में आने के लिए 🤣