30/05/2026
गेंदबाज़ गेंद फेंक कर हैरान थे, फील्डर मैदान में हैरान थे, कमेंटेटर स्टूडियो में हैरान थे और दर्शक टीवी पर हैरान थे, किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह हो क्या रहा है ??
क्योंकि आज से पहले किसी की भी नज़र से क्रिकेट में इस तरह के शॉट गुज़रे ही नहीं थे!!
यह एक मिरेकल लग रहा था एक जादू लग रहा था..
7 मार्च 2002 की बात है, जब भारतीय टीम अपने घरेलू मैदान पर जिम्बाब्वे के खिलाफ एक वनडे मैच खेल रही थी।
वह फरीदाबाद का दिन किसी बुरे सपने की तरह था, जिसे आज भी क्रिकेट प्रेमी भूल नहीं पाए हैं।
पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने एक मजबूत स्कोर खड़ा किया था।
लक्ष्मण 76, गाँगुली 57, अगरकर 40, कैफ 39, मोंगिआ 25
की बल्लेबाजी की बदौलत भारत ने निर्धारित 50 ओवरों में 274 रनों का चुनौतीपूर्ण लक्ष्य जिम्बाब्वे के सामने रखा था। उस समय 275 का लक्ष्य चेज करना काफी मुश्किल माना जाता था, और भारतीय खेमा जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त था।
मैच के अधिकतर समय तक भारत ने अपनी पकड़ बनाए रखी थी। जिम्बाब्वे के विकेट लगातार गिर रहे थे और ऐसा लग रहा था कि भारतीय गेंदबाज आसानी से मैच खत्म कर देंगे।
लेकिन क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है, और वही हुआ। जब Daugi Marillier बल्लेबाज़ी करने आए, तो जिम्बाब्वे की स्थिति बेहद नाजुक थी। मलेर नंबर 9 पर बल्लेबाजी करने उतरे थे और उस समय टीम का स्कोर 44.2 वें ओवर में 210/8 रन था। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यहां से मैच पलट सकता है।
Marellier का क्रीज़ पर आना और वो शॉट्स खेलना, जिसने दुनिया को सन्न कर दिया था,
एक जादू जैसा था।
आज जिसे हम 'स्कूप' या 'दिलशान स्कूप' कहते हैं, उस वक्त क्रिकेट की दुनिया में वो शॉट किसी को नहीं पता था। वो गेंद को विकेटकीपर के ऊपर से अजीबोगरीब ढंग से स्कूप कर रहे थे।
उस दौर में ऐसा शॉट खेलना तो दूर, किसी ने सोचा भी नहीं था। वो लगातार जहीर खान और अन्य गेंदबाजों को अपनी कलाकारी से चकमा दे रहे थे।
जहीर खान का वो अंतिम ओवर शायद भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे दर्दनाक ओवरों में गिना जाता है, जिसमें Marellier ने भारत के मुंह से जीत छीन ली थी।
शायद उस समय दुनिया का कोई गेंदबाज़ ऐसे शॉट्स के लिए तैयार ही नहीं था । उसके सपने मैन भी यह शॉट नहीं थे ।
पूरा स्टेडियम और टीवी के सामने बैठे करोड़ों भारतीय दर्शक यह देखकर हैरान थे कि कैसे एक अनजान सा खिलाड़ी अचानक सुपरमैन बन गया।
Marellier की उन 24 गेंदों ने 56 रन बनाकर पूरा खेल बदल दिया।
भारत के हाथ में आई जीत फिसल गई और जिम्बाब्वे ने अंतिम ओवरों में चमत्कार करते हुए 1 विकेट से मैच जीत लिया।
वह जीत केवल एक रन की नहीं थी, बल्कि एक ऐसी हार थी जिसने भारतीय गेंदबाजों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वाकई क्रिकेट का खेल बदल रहा है।
मारेलियर के वो शॉट्स आज के 'रैंप' और 'स्कूप' का जनक बने। उस दिन फरीदाबाद में जो हुआ, वो क्रिकेट के इतिहास में हार-जीत से ऊपर उठकर उस अविश्वसनीय कला के लिए दर्ज हो गया, जिसे दुनिया ने पहली बार देखा था। आज भी जब कोई बल्लेबाज स्कूप खेलता है, तो बरबस डग्लस मलेर की वो शाम याद आ जाती है। यह मैच याद दिलाता है कि क्रिकेट में आखिरी गेंद तक कुछ भी कहना मुश्किल है।
मुझे आज भी याद है, मेने वो मैच लाइव देखा था ।
क्या आपने देखा था ?
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S Raj Hanu
27/05/2026
वैभव सूर्यवंशी की क्या तारीफ करूं? सच कहूं तो आज मेरे पास लफ्ज ही कम पड़ गए हैं! क्रिकेट के मैदान पर न तो ऐसा बवंडर पहले कभी देखा था, न सुना था, और मजे की बात तो यह है कि क्रिकेट के बड़े-बड़े दिग्गजों और एक्सपर्ट्स के पास भी इस विशुद्ध चमत्कार की कोई व्याख्या नहीं है। महज 15 साल की उम्र में यह लड़का जिस तरह से रिकॉर्ड्स की धज्जियां उड़ा रहा है, उसे देखकर साफ लगता है कि वह कोई आम क्रिकेटर नहीं, बल्कि एक असाधारण और विलक्षण प्रतिभा है। उसका खेल देखकर ऐसा महसूस होता है मानो क्रिकेट उसके लिए कोई पसीने बहाने वाला खेल नहीं, बल्कि कोई प्राकृतिक और जादुई कला है। सामने वाला गेंदबाज चाहे चालाकी से स्लोअर फेंके, खौफनाक बाउंसर मारे, कटर का जाल बिछाए या अपनी लाइन-लेंथ बदले... इस लड़के के बल्ले से जवाब सिर्फ एक ही निकलता है गगनचुंबी छक्का!
जरा इस खौफनाक मंजर की कल्पना कीजिए सामने वो गेंदबाज है जिसने इंटरनेशनल क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट में राज किया है, जिसने वर्ल्ड कप और वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप की ट्रॉफी उठाई है, जिसके नाम 70-75 टेस्ट मैचों का विशाल अनुभव है... और वो गेंदबाज भी इस 15 साल के किशोर के सामने एकदम बेबस और लाचार नजर आता है। वहीं दूसरी तरफ, उसका इंटरनेशनल तजुर्बे वाला साथी ओपनर उन्हीं गेंदों का सामना करते हुए हांफता और संघर्ष करता दिख रहा है। जहां साथी बल्लेबाज 20 गेंदों में बमुश्किल 25 रनों पर अटका पड़ा है, वहीं यह लड़का महज 20 गेंदों में 80 का आंकड़ा पार कर तूफान ला देता है। 29 गेंदों में 97 रन और 12 आसमानी छक्के! ये आंकड़े किसी रियल क्रिकेट मैच के नहीं, बल्कि किसी प्लेस्टेशन के वीडियो गेम के लगते हैं। मजे की बात यह है कि उसे चौके मारने में कोई खास दिलचस्पी नहीं है; उसका दिमाग तो गेंद को सीधे स्टैंड्स में दर्शकों के बीच भेजने पर ही सेट रहता है।
सबसे बड़ी और हैरान करने वाली बात यह है कि सूर्यवंशी क्रिकेट की किसी भी पुरानी और तयशुदा किताब में फिट ही नहीं बैठता। क्रिकेट के पुराने विशेषज्ञ कहते हैं कि पहले अपनी तकनीक निखारो, फिर टेम्परामेंट बनाओ, और तब जाकर बड़े गेंदबाजों का सामना करने की सोचो। लेकिन यह लड़का तो मानो उन किताबों के पन्नों को फाड़कर ही पैदा हुआ है। भला इसे कोई क्या सिखाएगा? हकीकत तो यह है कि यह लड़का खुद आज पूरी दुनिया को फीयरलेस क्रिकेट का एक नया अध्याय पढ़ा रहा है। अंडर-19 के मंच पर कोहराम मचाने के बाद, अब आईपीएल के इस महासागर में भी उसका वही खौफनाक अवतार देखने को मिल रहा है।
अगर आज यह लड़का शतक पूरा कर लेता, तो आईपीएल इतिहास का एक और सबसे बड़ा रिकॉर्ड चकनाचूर हो जाता सबसे कम गेंदों में शतक ठोकने का रिकॉर्ड! और जरा सोचिए, उसकी तुलना किससे की जा रही है? साक्षात क्रिस गेल जैसे दैत्याकार पावर हिटर से! फासला देखिए एक तरफ गेल का वो विशाल शरीर और राक्षसी ताकत, और दूसरी तरफ यह 15 साल का किशोर!
जिन खुशनसीब लोगों ने 16 साल के सचिन तेंदुलकर को वसीम अकरम, अब्दुल कादिर और इमरान खान जैसे खूंखार गेंदबाजों की धज्जियां उड़ाते देखा होगा, यकीनन उन्हें भी ठीक वैसा ही अहसास हुआ होगा कि कोई आम खिलाड़ी नहीं, बल्कि क्रिकेट का एक नया युग बदलने वाला मसीहा आया है। आज सूर्यवंशी की बैटिंग देखकर हमें भी हूबहू वही महसूस हो रही है। इंटरनेशनल स्तर के दिग्गजों को वो ऐसे पीट रहा है मानो किसी गली-मोहल्ले का टूर्नामेंट चल रहा हो। ऐसा लग रहा है जैसे वह इस खेल को उस डायमेंशन में खेल रहा है, जहां पहुंचने की अभी बाकी दुनिया सोच भी नहीं सकती।
अगर इस लड़के की आंखों में रनों की यही आग, यह अटूट आत्मविश्वास और यह खौफनाक निडरता इसी तरह बरकरार रही, तो लिखकर रख लीजिए आने वाले सालों में यह लड़का अकेले ही क्रिकेट की पूरी परिभाषा बदलकर रख देगा!
26/05/2026
अफ्रीका ने मैच बस जीत ही लिया था कि अचानक खेल ही पलट गया | हर्षल गिब्स का मैदान से बाहर जाना था और भारत का एक हारा हुआ मैच पलट कर जीतना था ।
ICC CHAMPION TROPHY 2002
भारत बनाम दक्षिण अफ्रीका ।
जब हर्शेल गिब्स का 'रिटायर हर्ट' होना भारत के लिए वरदान बन गया! 🇮🇳
आज भी जब क्रिकेट इतिहास के सबसे बड़े 'टर्निंग पॉइंट्स' की बात होती है, तो 2002 चैंपियंस ट्रॉफी का वो सेमीफाइनल (भारत बनाम दक्षिण अफ्रीका) सबको याद आता है।
एक ऐसा मैच जो भारत लगभग हार चुका था, लेकिन किस्मत ने पासा पलट दिया।
मैच का पूरा लेखा-जोखा:
* पहले बल्लेबाजी: भारत ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी चुनी और 261/9 का सम्मानजनक स्कोर खड़ा किया। (युवराज सिंह और सहवाग की शानदार पारियां)।
* लक्ष्य: दक्षिण अफ्रीका को जीत के लिए 262 रन चाहिए थे।
गिब्स का तूफान और वो दर्दनाक मोड़:
दक्षिण अफ्रीका की शुरुआत थोड़ी खराब रही
ज़हीर खान ने ग्रीम स्मिथ का शिकार कर लिया ।
लेकिन उअके बाद आए जेक केलिस ने गिब्स के साथ खेल हि पलट दिया , अब अफ्रीका की स्तिथी बेहद मजबूत थी।
हर्शेल गिब्स क्रीज पर पैर जमा चुके थे।
उन्होंने भारतीय गेंदबाजों की जमकर खबर ली और अपना शतक पूरा किया।
और फिर वोह हुआ जो अफ्रीका के लिए बहुत बुरा था ।
गिब्स 116 रन (119 गेंद) पर खेल रहे थे। स्कोर था 192/1। दक्षिण अफ्रीका को जीत के लिए सिर्फ 70 रनों की जरूरत थी और हाथ में 9 विकेट थे।
कोलंबो की भीषण उमस और गर्मी के कारण गिब्स को गंभीर मांसपेशियों में खिंचाव (Severe Cramps) आ गए। वे इतने दर्द में थे कि बल्ला पकड़ना भी मुश्किल था, जिसके कारण उन्हें 'रिटायर हर्ट' होकर मैदान छोड़ना पड़ा।
गिब्स के जाते ही क्या हुआ? (मैच का असली ड्रामा)
जैसे ही गिब्स बाहर गए, भारतीय कप्तान सौरव गांगुली ने आक्रामक फील्डिंग लगा दी।
'चोकर्स' के नाम से मशहूर दक्षिण अफ्रीका दबाव में बिखर गई:
* हरभजन और सहवाग का जादू: भज्जी और वीरू ने अपनी स्पिन से रनों की गति पर ब्रेक लगा दिया।
* विकेटों की झड़ी: जोंटी रोड्स और बोए डीपेनार जैसे बल्लेबाज दबाव नहीं झेल पाए।
2 ओवर मैं 25 रन चाहिए थे ।
ज़हीर खान 49 वा ओवर लेकर आए और मात्र 5 रन दिए ।
* अंतिम ओवर का रोमांच: आखिरी ओवर में अफ्रीका को 21 रन चाहिए थे, और गांगुली ने गेंद थमा दी वीरेंद्र सेहवाग को ।
सेहवाग की पहली ही गेंद पर केलिस ने छक्का जड़ दिया ।
केलिस भी 97 पे पहुच गए ।
अगली गेंद पर भी जैक कैलिस ने छक्का मारने की कोशिश की लेकिन गेंद बल्ले का किनारा लेकर उछल गई और राहुल द्रविड़ जो उस समय कीपिंग कर रहे थे उन्होंने कैच पकड़ ली ।
उसके बाद पिच पर आए लान्स क्लूजनर ।
क्लॉज़्नर ने भी दो गेंद पर दो-दो रन दिए लेकिन उसके बाद वह भी वीरेंद्र सहवाग की गेंद पर आउट हो गए और
नतीजा: भारत ने यह मैच 10 रन से जीतकर फाइनल में प्रवेश किया! 🏆
क्या आपको गिब्स का वोह रिटायर मोमेंट याद है?
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S Raj Hanu
23/05/2026
में धमाल मचाने के बावजूद #वैभव सूर्यवंशी को टीम #इंडिया में मौका नहीं मिला।
#अफगानिस्तान सीरीज के लिए टीम चयन में उनकी राह में 5 बड़ी वजहें सामने आई हैं।
बताया जा रहा है कि #यशस्वी जायसवाल पहले से चयनकर्ताओं की प्राथमिकता में हैं। वहीं फिटनेस, कमजोर फील्डिंग, #वनडे टीम में ओपनर्स की भीड़ और टी20 #स्पेशलिस्ट इमेज भी बड़ी वजह बनी।
अब सवाल यही है —
क्या वैभव को जल्द टीम इंडिया में मौका मिलना चाहिए?
20/05/2026
अनुभव सिर्फ प्लेइंग इलेवन तक सीमित नहीं होता! लखनऊ के खिलाफ मैच में भले ही रवींद्र जडेजा मैदान पर न हों, लेकिन बाउंड्री पर खड़े होकर युवा यशस्वी जायसवाल को एक कोच की तरह गाइड करते दिखे, सीनियर खिलाड़ियों की मौजूदगी टीम के लिए कितनी अनमोल है। सीख और समर्पण का एक बेहतरीन नजारा।"
13/05/2026
सुना है आईपीएल की टीआरपी में भारी गिरावट आई है। टीआरपी में गिरावट का आना इस बात का सुबूत है कि इस लीग की लोकप्रियता बहुत तेजी से कम हो रही है। अगर टीआरपी वाला लफड़ा किनारे पर कर दिया जाए और इस मामले में न पड़ा जाए कि यह सही है या गलत और सिर्फ एक आम क्रिकेट फैन की नजर से खुद ही महसूस करें तो मामला साफ हो जाता है कि आईपीएल में अब वो पहले वाली बात नही रही।
यह गिरावट क्यों आई है और लोगों की दिलचस्पी आईपीएल से कम क्यों हो रही है अगर इसकी तह तक जाने की कोशिश की जाए तो पानी की तरह सभी चीजें एक एक करके साफ हो जाएंगी। वास्तव में आईपीएल एक ग्लोबल स्तर की टी20 लीग है जिसमें दुनिया के सभी देशों के क्रिकेट खिलाड़ी खेलते हैं। बीसीसीआई द्वारा कुछ देशों के खिलाड़ियों को सीधे तौर पर आईपीएल खेलने से मना कर देना भी इस प्रतिष्ठित टी20 लीग के पतन का एक कारण हो सकता है।
आईपीएल के पतन का जो सबसे अहम कारण लग रहा है वह है हर बार की तरह अचानक ही किसी अजेय टीम का हारने लगना और लगातार हार से परेशान किसी टीम का अचानक ही लगातार जीतने लगना। इस आईपीएल सीजन ही नहीं पिछले सीजन भी यही कहानी हुई थी। अचानक ही वो टीम जो पॉइंट टेबल में टॉप पर रहती है वो हारने लगती है और प्वाइंट टेबल में नीचे रह रही टीम अचानक ही जीतने लगती है।
पंजाब किंग्स,गुजरात टाइटंस और कोलकाता नाइट राइडर्स यह ऐसी टीमें हैं जिनके प्रदर्शन यह साबित करते हैं कि दाल में कुछ तो काला जरूर है। पंजाब किंग्स और गुजरात टाइटंस टीम की अगर तुलना की जाए तो पंजाब किंग्स के सामने गुजरात टाइटंस की टीम बल्लेबाजी के मामले में बिल्कुल भी नही टिकती। अगर पंजाब किंग्स ने इस साल बल्लेबाजी में मोटा माटी ढाई सौ के लगभग छक्के जड़े होंगे तो गुजरात टाइटंस की पूरी टीम इस सीजन अभी तक सौ छक्के भी नहीं लगा सकी होगी।
गुजरात टाइटंस और पंजाब किंग्स की टीम दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। दोनों इस साल अपने अभी तक 11-11 मैच खेल चुके हैं। गुजरात टाइटंस टीम ने इनमें से 7 मैचों में दर्ज की है। पंजाब किंग्स की टीम अभी तक केवल 6 मैच जीत सकी है और वो भी लगातार जीती थी। यह सोचकर भी सिर घूम जाता है कि गुजरात टाइटंस की टीम जिसने पूरे सीजन 100 छक्के भी नहीं लगाए हों वो टीम पंजाब किंग्स से ज्यादा मैच जीत चुकी है जिसने ढाई सौ के करीब छक्के जड़े हैं।
सवाल यह है कि क्या पंजाब किंग्स लगातार 6 मैच जीतने के बाद अचानक ही इतनी खराब टीम हो गई कि लगातार 4 मैच हार गई? क्या गुजरात टाइटंस इतनी मजबूत टीम नजर आती है कि वो लगातार 4 मैच जीत जाए और प्वाइंट टेबल में पंजाब किंग्स से आगे खड़ी हो? क्या श्रेयस अय्यर कप्तानी के मामले में शुभमन गिल से पीछे हैं? सबका जवाब ढूंढा जाना चाहिए। सच सामने आना चाहिए।
ऐसी ही कहानी कोलकाता नाइट राइडर्स की भी है। वो कोलकाता नाइट राइडर्स जो शुरू में तो लगातार 5 मैच हार चुकी थी और लग रहा था बहुत खराब टीम है वो अचानक ही अजेय नजर आने लगी है। कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम लगातार 4 मैच जीत चुकी है। सवाल है कि कोलकाता नाइट राइडर्स ने अचानक ही क्या डोज ले ली कि अजेय नजर आने लगी?
चेन्नई सुपर किंग्स शुरू में हारी तो अब अजेय नजर आने लगी है। वो अजिंक्य रहाणे जो शुरू में खराब कप्तान नजर आ रहे थे अचानक ही बहुत अच्छे कप्तान नजर आने लगे। ऋतुराज गायकवाड़ जिनको लोग क्या नहीं कह रहे थे अचानक ही सुपर कप्तान साबित होने लगे। श्रेयस अय्यर जो शुरू में अजेय कप्तान बने थे अचानक औसत कप्तान नजर आने लगे।
यहां लगता है सच है कि यह आईपीएल है और यहां क्या हो जाए कुछ नही पता। यहां न तो कोई कप्तान अच्छा है और न ही कोई कप्तान खराब। न कोई टीम अच्छी है और न ही कोई टीम खराब है। शुरु में चाहे जो जीते लेकिन अंत में प्लेऑफ के लिए रोमांच बनाए रखने के लिए वही टीम जीतती है जिसके जीतने से प्लेऑफ की रेस में रोमांच बना रहे। यही कारण है कि अब सबको पहले से ही अहसास हो जाता है कि क्या हो सकता है। आईपीएल की टीआरपी भी हो सकता है इसी वजह से गिर रही हो।
30/04/2026
आईपीएल के एक सीजन में सबसे ज्यादा छक्कों का रिकॉर्ड आज भी यूनिवर्स बॉस 'क्रिस गेल' के नाम है। साल 2012 में उन्होंने 59 छक्के लगाए थे, यानी 14 साल पुराना रिकॉर्ड आज भी कायम है लेकिन अब 2026 में ये रिकॉर्ड 15 साल का लड़का तोड़ सकता है। जी हाँ, सही समझे वैभव सूर्यवंशी, आधे सीजन में ही 37 छक्के ठोक चुका है। अगर यही रफ्तार रही, तो इस साल वो रिकॉर्ड टूट सकता है। और अगर ऐसा हुआ, तो ये सिर्फ रिकॉर्ड टूटना नहीं होगा, बल्कि इतिहास लिखा जाएगा- 14 साल पुराना रिकॉर्ड, एक 15 साल के लड़के ने तोड़ा!
सिर्फ छक्के ही नहीं, रन बनाने की रफ्तार भी हैरान कर देने वाली है। महज 167 गेंदों में 400 रन ठोक दिए हैं। ये आंकड़े नहीं, एक घोषणा है- एक तूफान के आने की। दुनिया भर के इंटरनेशनल खिलाड़ी भी हैरान हैं कि कोई इतनी तेज बल्लेबाजी लगातार मैचों में कैसे कर सकता है।
अब सवाल है कि ये कहाँ तक जाएगा? आईपीएल के बाद टीम इंडिया में उसका चयन लगभग तय माना जा रहा है और अगर ऐसा होता है, तो ये सिर्फ एक खिलाड़ी का नहीं, एक नए युग (सूर्यवंशी) का आगाज़ होगा। ~गोविंद परिहार 🙏
27/04/2026
लखनऊ सुपर जायंट्स के महान रणनीतिकार कोच और जीनियस कप्तान को मेरा साष्टांग दंडवत प्रणाम! सच कहूं तो, ईश्वर क्रिकेट के ऐसे अद्भुत बुद्धि वाले चाणक्य किसी दुश्मन टीम को भी न दे।
जरा इतिहास के पन्नों पर जमी धूल हटाकर देखिए। पूरी दुनिया जानती है कि टी20 क्रिकेट के इतिहास में आज तक सिर्फ एक ही बार सुपर ओवर मेडेन गया है। यह चमत्कार सुनील नरेन ने किया था और उस वक्त सामने स्ट्राइक पर कौन था? यही निकोलस पूरन! और मजे की बात यह है कि उस दौर में पूरन अपने करियर के सबसे खौफनाक और प्राइम फॉर्म में हुआ करते थे।
अब जरा कल रात के ड्रामे पर आते हैं। आज के हालात में जब निकोलस पूरन का बल्ला बुरी तरह रूठा हुआ है और गेंद उनके बल्ले के बीचों-बीच आ ही नहीं रही, तब भी लखनऊ के इस महान थिंक-टैंक ने उन्हें उसी सुनील नरेन की जादुई फिरकी के सामने सुपर ओवर में बलि का बकरा बनाकर भेज दिया। नतीजा वही हुआ जिसकी पूरी दुनिया को उम्मीद थी पहली ही गेंद पर पूरन चारो खाने चित और क्लीन बोल्ड! इसके बाद तीसरी गेंद पर एडेन मार्करम भी अपना विकेट फेंक कर चलते बने।
लेकिन इस पूरी कॉमेडी ऑफ एरर्स की हद तो तब हो गई, जब टीम मैनेजमेंट की इस बचकानी रणनीति का अगला नमूना देखने को मिला। विकेट गिरने के बाद खुद कप्तान ऋषभ पंत क्रीज पर चले आए, जबकि डगआउट में टीम का सबसे खूंखार, सबसे बड़ा हिटर और शानदार फॉर्म में चल रहा मिचेल मार्श सिर्फ बैठकर ताली बजाने के लिए छोड़ दिया गया। इंटरनेशनल क्रिकेट के इतने बड़े मंच पर ऐसी गली क्रिकेट वाली रणनीति मैंने अपनी जिंदगी में आज तक नहीं देखी!
सबसे ज्यादा अफसोस और दिल टूटने वाली बात तो मोहम्मद शमी की उस ऐतिहासिक कोशिश का यूं बर्बाद होना है। असली मैच की आखिरी रोमांचक गेंद पर शमी ने वो जादुई छक्का जड़कर न सिर्फ हार के जबड़े से मैच छीना था, बल्कि सुपर ओवर का एक सुनहरा और मोमेंटम से भरा मंच तैयार किया था। लेकिन इन महान रणनीतिकारों की घटिया और डरपोक सोच ने उस पूरी मेहनत पर एक ही झटके में पानी फेर दिया। वाकई, कई बार आप सामने वाली टीम की ताकत से नहीं, बल्कि अपनी ही टीम की बेवकूफी से मैच हारते हैं!
19/04/2026
"कालू है ना सब संभाल लेगा"
सचिन तेंदुलकर मुम्बई शहर में ही किसी टीम के लिये लोकल मैच खेलने के लिये गये थे और उस समय सचिन की उम्र लगभग 13 साल थी तो सामने वाली टीम के प्लेयर घबरा रहे थे की उस टीम में तो "तेंदुलया" है। तो विपक्षी टीम के कैप्टेन ने अपने प्लेयरों से कहा घबराने की कोई बात नहीं है अगर उनके पास तेंदुलया है तो अपने पास कालू है।
ये तेंदुलया लोग तेंदुलकर को प्यार से कहते थे और कालू विनोद कांबली को। तेंदुलया और कालू का बचपन से ही पूरे मुम्बई की क्रिकेट में सिक्का चलता था।
फिर ऐसा क्या हुआ कि मुम्बई की गलियों वाला तेंदुलया गॉड ऑफ क्रिकेट बन गया और कालू आज दर दर की ठोकरें खा रहा है। जिसकी यादाश्त तक चली गयी है। जिसके पास ढंग से इलाज करवाने तक के पैसे नहीं है। कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि कांबली के पास ढंग से खाना खाने के पैसे भी नहीं है।
बात शुरुआत से करते हैं, विनोद कांबली का जन्म मुम्बई की एक गली में बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था, उनके पिता एक मकेनिक थे और वो क्लब क्रिकेट खेलते थे तो कांबली ने भी बचपन से बल्ला थाम लिया। आर्थिक स्तिथि बहुत अच्छी ना होने के बावजूद कांबली के पिता ने उनके टैलेंट को देखते हुए उन्हें गुरु रमाकांत आचरेकार के पास ले गये, जहाँ पर सचिन तेंदुलकर और प्रवीण आमरे पहले से ही क्रिकेट की बारीकीयाँ सीख रहे थे। कहते हैं उन तीनों खिलाड़ियों के टैलेंट को देखते हुए उनके गुरु ने उसी टाइम कह दिया था कि ये तीनों एक दिन इंडिया के लिये खेलेंगे। और उनकी बात सच भी साबित हुई।
हैरिस शील्ड का एक मैच चल रहा था, सचिन और कांबली ने लगभग 700 रन की साझेदारी कर दी और दोनों बैटिंग में इतना खो गये कि उनके कोच रमाकांत आचरेकार पारी घोषित करने के लिये कह रहे थे और उनको पता ही नहीं चला। बाद में कोच ने उन दोनों को बुलाकर खूब डांट लगायी। लेकिन उस मैच के बाद रातों रात वो दोनों मुम्बई क्रिकेट के सुपरस्टार बन गये थे।
उन दोनों का सफर चलता रहा जहाँ सचिन को मात्र 16 साल की उम्र में इंडिया के लिये खेलने का मौका मिला वहीं कांबली को एक दो साल बाद मौका मिला।
मैं उस समय क्लास 6था में था जब विनोद कांबली को इंडिया के लिये खेलने का मौका मिला। विनोद कांबली जो आये तो छाते ही चले गये। अपने कैरियर की इतनी जबरदस्त शुरुआत की कि शुरुआती 7 मैचों में ही 793 रन बना दिये। सचिन तेंदुलकर भी उनके आगे फीके लगने लगे। अपने तीसरे और चौथे टेस्ट में लगातार 2 दोहरे शतक बना दिये। सारे क्रिकेट जगत में सिर्फ एक ही नाम की चर्चा थी। लोगों ने कहना शुरू कर दिया वर्ल्ड क्रिकेट का ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं होगा जो कांबली के नाम नहीं होगा। ये बात सच भी है कांबली में वो बात थी लोगों का सोचना गलत भी नहीं था।
कुछ क्रिकेट पंडितों ने तो विनोद कांबली को सचिन तेंदुलकर से भी ज्यादा टैलेंटेड बताना शुरू कर दिया। आज मैं भी अपने मन का पाप बताता हूँ उस समय मेरे दिल के भी किसी कोने से यहीं आवाज आनी शुरू हो गयी थी कि विनोद कांबली सचिन तेंदुलकर से बेहतर है।
जब विनोद कांबली इतने टैलेंटेड प्लेयर थे और उनके कैरियर की इतनी जबरदस्त शुरुआत भी हो गयी थी तो विनोद कांबली इतनी गुमनामी में कैसे चले गये कि आज उनकी ये कंडीशन है।
सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली की बैटिंग में भले ही ज्यादा फर्क ना रहा हो लेकिन उनके संस्कार, व्यवहार, और परवरिश में जमीन आसमान का फर्क था। जिसकी वजह से आज सचिन कहाँ हैं और विनोद कांबली कहाँ हैं।
रातों रात मिली दौलत और शोहरत को विनोद कांबली संभाल नहीं पाये, कामयाबी उनके सिर पर सवार हो गयी। रात रात भर क्लब में जाना पार्टी करना, अनलिमिटेड सिगरेट और शराब पीना उनकी दिनचर्या बन गयी। लेट रात तक पार्टी करने के बाद आना और प्रैक्टिस में भी ना जाने से उनका क्रिकेट प्रभावित होने लगा उनकी फिटनेस भी धीरे धीरे बेकार होती गयी। कई बार उनके ऊपर अनुशासनात्मक कार्यवाही भी हुई लेकिन वो नहीं सुधरे। और उन्होंने अपने आपको क्रिकेट से बड़ा समझने की भूल कर दी। धीरे धीरे उनकी फॉर्म में गिरावट आती गयी जिससे उनको इंडियन टीम में अपने प्लेस से भी हाथ धोना पड़ा।
कहते हैं जो समय के साथ नहीं चलता उसको ताउम्र ठोकर ही लगती है, विनोद कांबली के साथ भी ऐसा ही हुआ। कई बार उनकी टीम में वापसी हुई लेकिन वो अपना प्राइम खो चुके थे। और उस तरह से परफॉर्म नहीं कर पाये जैसी उनसे अपेक्षा थी। उस दौर में सौरभ गाँगुली और राहुल द्रविड़ का उदय हो चुका था जिससे विनोद कांबली के कैरियर पर हमेशा के लिये विराम लग गया।
इंडियन क्रिकेट में कभी ध्रुव तारे की तरह चमकने वाला सितारा आज गुमनामी में कहीं खो गया।
क्रिकेट में सब कुछ खत्म होने के बाद विनोद कांबली ने राजनीति और फिल्म में भी हाथ आजमाया लेकिन अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली। शायद विनोद कांबली उन चीजों के लिये बना ही नहीं था। वो बना तो क्रिकेट की दुनिया पर राज करने के लिये लेकिन वक्त और हालत ने ऐसी करवट बदली कि वो फिर कभी संभल नहीं पाये ।
हर तरफ नाकामयाबी के बाद आर्थिक तंगी और बीमारियों ने चारों तरफ से घेर लिया। लोगों ने उनको सिगरेट मांग मांगकर पीते हुए देखा। लोग कहते हैं उनके दोस्त सचिन ने बहुत सारे मौकों पर पैसे की मदद की। लेकिन कोई कितनी मदद कर सकता है। हताश और निराश विनोद कांबली को लोगों ने लाइव न्यूज़ चैनल पर रोते भी देखा है। BCCI ने भी उनके इलाज के लिये कुछ मदद की थी। कुछ सीनियर खिलाड़ियों ने भी विनोद कांबली के लिये आवाज उठायी थी।
आज विनोद कांबली की इस दुर्दशा को देखकर रोना आता है क्यूँकि हम वो लोग हैं जिन्होंने इनको पहले मैच से लेकर आखिरी मैच तक खेलते हुए देखा है और महसूस किया है कि विनोद कांबली कितना बड़ा प्लेयर था।
एक कहावत है "शाशन वही पाता है जिसके अंदर अनुशासन हो"। ये कहावत विनोद कांबली और सचिन तेंदुलकर पर बिलकुल सटीक बैठती है। उसी अनुशासन की वजह से सचिन आज कहाँ हैं और विनोद कांबली कहाँ हैं।
अगर आपकी भी कोई विनोद कांबली को लेकर कोई मेमोरी है तो बतायें और अगर आपको ये स्टोरी पसंद आयी हो तो प्लीज शेयर करें।
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14/04/2026
"अंधेरा हो चुका था, दिख कुछ नहीं रहा था!" लेकिन उस एक चौके ने पाकिस्तान का घमंड तोड़ दिया! हृषिकेश कानिटकर: वो गुमनाम हीरो जिसने भारत को वर्ल्ड रिकॉर्ड जीता उभर! (1998)
1998 में वनडे क्रिकेट में 315 रन चेज़ (Chase) करना वैसा ही था जैसे आज के राउंड में 450 रन चेज़ करना। नामुमकिन!
इंडिपेंडेंस कप का फाइनल (तीसरा फाइनल)। ढाका।
साइड अनवर (140) और एजाज अहमद (117) ने भारतीय गेंदबाजों की धज्जियां उड़ा दी थीं। पाकिस्तान ने 314 रन बनाए।
दादा और रॉबिन की लड़ाई:
सबको लगा भारत हार गया।
लेकिन सौरव गांगुली (124) और रॉबिन सिंह (82) ने हार नहीं मानी। उन्होंने अद्भुत साझेदारी की।
लेकिन जैसे ही ये दोनों आउट हुए, भारतीय टीम फिर लड़खड़ा गई।
मैच आखिरी ओवर तक गया। मैदान पर घुप अंधेरा (Bad Light) हो चुका था। अंपायरों ने खेल नहीं रोका। गेंद देखना मुश्किल हो रहा था।
वो 2 गेंदे, 3 रन:
आखिरी ओवर पाकिस्तान के जादूगर स्पिनर सकलैन मुश्ताक कर रहे थे।
इक्वालेशन: 2 गेंदे, 3 रन।
क्रीज पर थे एक नए और युवा बाएं हाथ के बैट्समैन—हृषिकेश कानिटकर (Hrishikesh Kanitkar)।
प्रेशर ऐसा था कि सांसें रुकी हुई थीं। करोड़ों भारतीय टीवी से जुड़ते थे और दुआ मांग रहे थे—"बस आउट मत होना!"
कानिटकर का हिस्टोरिक चौका:
सकलैन ने गेंद फेंकी।
कानिटकर ने अपना पैर आगे निकाला और मिड-विकेट (Mid-wicket) की तरफ एक करारा शॉट मारा।
बॉल बाउंड्री के पार! चौका!
कानिटकर ने हवा में बल्ला और हेलमेट लहरया। यह सिर्फ एक जीत नहीं थी, यह वर्ल्ड रिकॉर्ड चेज़ (World Record Chase) था।
उस चौके ने 1986 के मियांदाद वाले कंधों का दर्द काफी हद तक कम कर दिया था।
वन-मैच वंडर:
मजे की बात यह है कि कानिटकर का करियर ज्यादा लंबा नहीं चला, लेकिन उस एक चौके ने उन्हें भारतीय क्रिकेट इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया। जब भी भारत-पाक रोमांचक मैचों की बात होती है, कानिटकर का नाम सबसे पहले आता है।
द वर्ल्ड रिकॉर्ड चेज़:
मैच: इंडिपेंडेंस कप फाइनल, ढाका (1998).
लक्ष्य: 315 रन का पीछा किया (उस समय एक वर्ल्ड रिकॉर्ड).
चुनौती: आखिरी ओवरों में बहुत खराब रोशनी में खेला।
हीरो: सौरव गांगुली (124) ने इसे सेट किया, कानिटकर ने इसे खत्म किया।
शॉट: सकलैन मुश्ताक की दूसरी गेंद पर एक बाउंड्री।
बदला: पाकिस्तान के खिलाफ पिछली दिल तोड़ने वाली हार का बदला लिया।
क्या आपको वो पल याद है जब कानिटकर ने चौका मारा था?
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