09/01/2026
अगर रोहित शर्मा की विरासत को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी श्रेयस अय्यर के कंधों पर रख दी होती, तो शायद ही कोई क्रिकेट प्रेमी या समझदार विशेषज्ञ इस फ़ैसले पर सवाल उठाता। भारतीय क्रिकेट के मौजूदा परिदृश्य में अगर किसी खिलाड़ी में नेचुरल लीडरशिप, मैच की नब्ज़ पहचानने की समझ और बड़े मौकों पर ठहराव दिखता है, तो वह श्रेयस अय्यर हैं।
आईपीएल हो या घरेलू क्रिकेट, अय्यर की कप्तानी हमेशा “शोर” नहीं करती, बल्कि काम बोलता है। वह कप्तान हैं जो कैमरों के सामने नहीं, ड्रेसिंग रूम के भीतर टीम बनाते हैं। शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है और विडंबना भी।
सवाल काबिलियत का नहीं, समीकरण का है
हकीकत यह है कि श्रेयस अय्यर वनडे कप्तानी के सबसे स्वाभाविक दावेदार थे। उनका बल्लेबाज़ी टेम्परामेंट, स्पिन के ख़िलाफ़ नियंत्रण, और मिडिल ऑर्डर से खेल को संभालने की क्षमता—ये सब किसी भी चयन समिति को आश्वस्त करने के लिए काफ़ी होना चाहिए था। लेकिन भारतीय क्रिकेट में फ़ैसले सिर्फ़ स्कोरकार्ड से नहीं होते, समीकरण भी देखे जाते हैं।
क्रिकेट के गलियारों में यह चर्चा आम है कि जब तक कोच की कुर्सी पर गौतम गंभीर बैठे हैं, तब तक श्रेयस अय्यर का कप्तान बनना लगभग नामुमकिन था। यह कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं, बल्कि पावर डायनेमिक्स का विश्लेषण है। गंभीर एक सशक्त व्यक्तित्व हैं, जिनका अपना क्रिकेट दर्शन है। और शायद यही वजह है कि उन्हें कप्तान के तौर पर कोई ऐसा सुपरस्टार रास नहीं आता, जो उनसे बड़ा नैरेटिव बन जाए।
#कोच की परछाई या कप्तान की पहचान?
आधुनिक क्रिकेट में कोच का रोल बेहद अहम है, लेकिन इतिहास गवाह है कि टीम की आत्मा कप्तान से बनती है। गंभीर शायद ऐसे कप्तान चाहते हैं जो रणनीति का चेहरा कम और रणनीति का माध्यम ज़्यादा हो—एक ऐसा लीडर जो कोच की सोच को बिना सवाल मैदान पर उतार दे।
श्रेयस अय्यर उस खांचे में फिट नहीं बैठते। वह अपनी सोच रखते हैं, मैदान पर फैसले लेते हैं और ज़रूरत पड़ने पर जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हैं। ऐसे कप्तान के साथ जीत मिली तो तालियां कप्तान के हिस्से ज़्यादा जाती हैं—और शायद यही असहजता है।
टी20 की कहानी भी कुछ अलग नहीं
टी20 फॉर्मेट में भी कुछ ऐसी ही पटकथा लिखी गई। रोहित शर्मा के बाद पूरी दुनिया मानकर चल रही थी कि हार्दिक पांड्या अगले कप्तान होंगे। बीसीसीआई की तैयारी भी उसी दिशा में थी। लेकिन ऐन वक्त पर फिटनेस और चोट का कार्ड खेला गया, और हार्दिक को रेस से बाहर कर दिया गया।
इसके बाद कप्तानी उस खिलाड़ी को सौंपी गई जो गंभीर की सोच के ज्यादा करीब माना गया। यहां भी संदेश साफ था—कप्तान ऐसा हो जो सिस्टम से बड़ा न हो।
#नजरें 2026 और 2027 पर
अब तस्वीर और भी साफ हो जाती है जब हम 2026 के टी20 विश्व कप और 2027 के वनडे विश्व कप पर नजर डालते हैं। गंभीर अच्छी तरह जानते हैं कि अगर उन्होंने अपनी पसंद के अपेक्षाकृत लो-प्रोफाइल कप्तानों के साथ ये टूर्नामेंट जीत लिए, तो इतिहास में कप्तान के करिश्मे से ज़्यादा कोच की “चाणक्य नीति” की चर्चा होगी।
यहां सवाल जीत का नहीं, क्रेडिट का है। और जब क्रेडिट की लड़ाई शुरू होती है, तो अक्सर सबसे ज़्यादा नुकसान उन्हीं खिलाड़ियों का होता है जो काम ज़्यादा और प्रचार कम करते हैं।
एक हीरा जो रेस में पीछे छूट गया
श्रेयस अय्यर उसी किस्म के खिलाड़ी हैं। न वे सुर्खियां मांगते हैं, न लॉबी बनाते हैं। शायद इसी वजह से वे कप्तानी की दौड़ में पीछे छूट गए। यह फैसला भारतीय क्रिकेट को आज नुकसान न पहुंचाए, लेकिन कल जब इतिहास लिखा जाएगा, तो यह सवाल जरूर पूछा जाएगा—
#क्या हमने सही कप्तान चुना था, या सिर्फ़ सही समीकरण?
क्योंकि भारतीय क्रिकेट ने कई बार देखा है—
ट्रॉफी जीतने से पहले सही लीडर चुनना पड़ता है।
और इस बार लगता है, उस चुनाव में एक असली लीडर पीछे रह गया।
08/01/2026
03/01/2026
02/01/2026
01/01/2026
24/12/2025
24/12/2025
23/12/2025
22/12/2025
22/12/2025
21/12/2025