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02/06/2026
आप मानो या ना मानो लेकिन 15 साल के वैभव ने छोटी सी उम्र में वो सबक सीख लिया है,जिसे समझने में लोगो की पूरी जिंदगी खत्म ह...
27/04/2026

आप मानो या ना मानो लेकिन 15 साल के वैभव ने छोटी सी उम्र में वो सबक सीख लिया है,जिसे समझने में लोगो की पूरी जिंदगी खत्म हो जाती है,सबक ये है कि,

Once is luck, twice is proof.”

दुनिया किसी के भी एक बार के कारनामे से कभी impress नहीं होती,एक बार की success को fluke माना जाता है, जैसे पिछले IPL में 35 गेंद में century, और under 19 के final में 175 रन मारने के बाद भी experts को वैभव पर DOUBT था, वैभव को उसकी PERFORMANCE पर नहीं उसकी उम्र पर जज किया जा रहा था।

फिर क्या, फिर वैभव ने prove करने का फैसला किया और इस IPL में,जो भी किया प्रूव करने के लिए किया।बुमराह की पहली गेंद पर छक्का मारने को है,कोई fluke न कहे,इसलिए दो गेंद बाद,वैभव बुमराह को फिर एक छक्का मारता है।

दुनिया के टॉप बॉलर को एक बार मारना कोई fluke न समझे इसलिए, वैभव अगले मैच में, भुवनेश्वर और हेजलवुड जैसे टॉप बॉलर को भी मैदान का पूरा चक्कर लगवाता है,और जब आधा IPL खत्म होने के बाद कमिंस वापस लौटे,तो उन्हें भी नहीं बख्शा, और उस प्रफुल्ल को भी नहीं,जिसने वैभव को गोल्डन डक पर आउट किया था।

इस साल Csk के खिलाफ उसकी 15 बाल कि फिफ्टी को कोई fluke न कहे,इसलिए ये लड़का दो मैच बाद फिर से उतनी ही गेंद में फिफ्टी मार कर दिखाता है,और आज फिर से।

बहुत से लोग,एक इनिंग, एक फिल्म,एक गाने या किसी एक video की कामयाबी के बाद, कामयाबी के जश्न में बिजी हो जाते है,और फिर उन्हें न इतिहास याद रखता है, ना ही लोग।

Life is cruel , आप चाहे सचिन तेंदुलकर के ही बेटे क्यू न हो, you have to prove yourself every day,in every game, आपको क्या लगता है,दुनिया एक रात की कामयाबी की वजह से धोनी,रोहित या विराट को महान मानती है? नहीं भाई,

धोनी को सब ग्रेट कैप्टन इसलिए नहीं मानते है,क्योंकि धोनी ने वर्ल्ड कप जिताया है, बल्कि इसलिए मानते है क्योंकि धोनी ने दो बार वर्ल्ड कप जिताया है,चार बार IPL जीता है।

रोहित शर्मा को सब hitman इसलिए नही बूलाते क्योंकि उन्होंने डबल सेंचुरी मारी है,बल्कि इसलिए बुलाते है,क्योंकि भाई में तीन तीन डबल सेंचुरी मारी है।

कोहली को chase master इसलिए नहीं कहते है,क्योंकि कोहली ने एक बार chase करके जिताया है, बल्कि इसलिए कहते है क्योंकि बार बार, या यू कहे कि हर बार करके दिखाया है।

जिंदगी पहाड़ पर गाड़ी चलाने जैसी है,जब आप पहाड़ पर गाड़ी ऊपर की तरफ चढ़ा रहे होते है,तो जितनी ऊंचाई पर आप पहुंचते है, gravity आपको उतनी ही ताकत से नीचे की तरफ खींचती है। इसी gravity से आगे वैभव का भी सामना होगा।

पर ऐसे में रास्ता एक ही होता है,कि बस ऊपर चढ़ते जाने का, कुछ भी हो जाए, ब्रेक न लो,इसलिए ये लड़का किसी मैच में किसी बोलर के खिलाफ रुकने थामने का सोच ही नहीं रहा है,क्योंकि उसे पता है कि जिस ऊंचाई पर उसे चढ़ना है,उस ऊंचाई के नीचे की खाई, दोगुनी ताकत से नीचे खींचती है, और अगर इसी तरह ये लड़का बिना ब्रेक के दौड़ता रहा, बहुत से बोलर के करियर खत्म करके मानेगा।

आप कोई भी काम करते है, किसी भी filed में है,उस filed का Boss बनना है तो success के लिए जितनी मेहनत करते है,उसकी दो गुना मेहनत success को repeat करने के लिए करे। और यकीन मानिए,एक बार आपको success repeat करने का चस्का लग गया, आप खुद अपनी potential देखकर हैरान हो जाएंगे।

इसलिए,पूरी जान लगाकर मेहनत कीजिए, और कामयाबी की ढलान पर ब्रेक लेने की गलती कभी मत कीजिएगा,रेंगते रहिए, इंच दर इंच,ही सही थोड़ा थोड़ा ही,ऊपर चढ़ते जाइए,बस रुकना नहीं, कामयाबी की ढलान पर ग्रैविटी लोगो को bully करने के लिए बदनाम है, पर आप अड़ जाए, तो सूर्यवंशी कहलाएंगे।

डॉ. नरोत्तम पुरी और रवि चतुर्वेदी: जब क्रिकेट का रोमांच 'ट्रांजिस्टर' में बंद होता था!!! आज हमारे पास HD स्क्रीन और रिप्...
27/04/2026

डॉ. नरोत्तम पुरी और रवि चतुर्वेदी: जब क्रिकेट का रोमांच 'ट्रांजिस्टर' में बंद होता था!!! आज हमारे पास HD स्क्रीन और रिप्ले हैं, लेकिन 70 और 80 के दशक में क्रिकेट का असली मज़ा रेडियो पर था।
अगर आप स्कूल या दफ्तर में होते थे, तो कान में इयरफोन लगाकर या जेब में छोटा ट्रांजिस्टर रखकर स्कोर पता करते थे।
इन दो आवाज़ों ने हमें क्रिकेट सिखाया:
डॉ. नरोत्तम पुरी (Dr. Narottam Puri):
पेशे से एक ईएनटी (ENT) डॉक्टर, लेकिन जुनून से क्रिकेट के विश्वकोश (Encyclopedia)।
उनकी आवाज़ में एक ठहराव और विद्वता थी। वे आंकड़ों (Stats) के जादूगर थे। जब वे बोलते थे, तो ऐसा लगता था कि कोई प्रोफेसर क्रिकेट पढ़ा रहा है।
"The ball races away to the boundary..." —उनका अंग्रेजी बोलने का तरीका बहुत ही सभ्य और सटीक था। वे 'क्विज़ टाइम' (Quiz Time) के लिए भी मशहूर थे।
🎙️ रवि चतुर्वेदी (Ravi Chaturvedi):
अगर नरोत्तम पुरी 'दिमाग' थे, तो रवि चतुर्वेदी 'दिल' थे।
हिंदी कमेंट्री के भीष्म पितामह! उनका उत्साह (Excitement) अलग ही लेवल पर होता था।
"गेंद सीमा रेखा की तरफ... और ये चार रन!"
उन्होंने हमें हिंदी में क्रिकेट की शब्दावली दी। 'मिड-विकेट', 'कवर ड्राइव' को हिंदी श्रोताओं के लिए आसान बनाया।
सुशील दोषी (Sushil Doshi):
इनका ज़िक्र भी ज़रूरी है। "इसी बीच..." उनका तकिया कलाम था। उनकी कमेंट्री में मालवा की मिठास और जोश दोनों था।
उस समय कमेंटेटर जो बोल देता था, वही हमारे लिए सच होता था। अगर उन्होंने कहा कि शॉट अच्छा था, तो हमने मान लिया कि शॉट अच्छा था!

27/04/2026

Sanju Samson has did it for the country and is now doing for CSK 🥶🔥....
27/04/2026

Sanju Samson has did it for the country and is now doing for CSK 🥶🔥....

Jay Shah said...🗣🗣“I am thinking that Shreyas Iyer should be made the new captain of the Indian team. Now Suryakumar Yad...
27/04/2026

Jay Shah said...🗣🗣
“I am thinking that Shreyas Iyer should be made the new captain of the Indian team. Now Suryakumar Yadav doesn’t have that spark anymore. Now your one vote will decide who you choose as your captain.”

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Congratulations Our Ace   on being selected in NKL2
27/04/2026

Congratulations Our Ace on being selected in NKL2

"जब दादा ने कहा मैं बिना कुंबले के ऑस्ट्रेलिया नहीं जाऊँगा और दाँव पर लगा दी अपनी कप्तानी अपना करिअर !" 🔥कहानी साल 2003-...
20/03/2026

"जब दादा ने कहा मैं बिना कुंबले के ऑस्ट्रेलिया नहीं जाऊँगा और दाँव पर लगा दी अपनी कप्तानी अपना करिअर !" 🔥

कहानी साल 2003-04 की है…भारत की टीम जाने वाली थी ऑस्ट्रेलिया, उस वक़्त की सबसे खतरनाक टीम के खिलाफ़।
और ड्रेसिंग रूम में हो रही थी एक ऐसी बहस… जो भारतीय क्रिकेट की दिशा बदलने वाली थी, चयन बैठक देर रात तक चली थी।
सेलेक्टर्स का साफ़ कहना था..
“अनिल कुंबले अब पुराने हो गए हैं, वो विदेशों में विकेट नहीं निकालते, ऑस्ट्रेलिया की पिचें उनके लायक नहीं।”

लेकिन सामने बैठे सौरव गांगुली ने कुर्सी पर सीधा झुक कर कहा
“मैं बिना कुंबले के ऑस्ट्रेलिया नहीं जाऊँगा।”
कमरा सन्नाटा छा चुका था सेलेक्टर्स ने आख़िरी चेतावनी दी ..

“अगर कुंबले विकेट नहीं लेंगे,
और टीम असफल रही… तो नया कप्तान चाहिए होगा।”
गांगुली ने सिर उठाया,
थोड़ा मुस्कराए,
और बस इतना बोले —
“फिर नया कप्तान ढूंढ लेना,
लेकिन कुंबले जाएगा।”

यही था वो दादा का जज़्बा,
जो हर साथी खिलाड़ी के पीछे ढाल बन खड़ा रहता था।
कुंबले को टीम में जगह मिली…
और फिर शुरू हुआ ऑस्ट्रेलिया का वो दौरा,
जो आज तक भारतीय क्रिकेट की यादों में सुनहरी स्याही से लिखा है।

एडिलेड, मेलबर्न, सिडनी –
हर मैदान पर कुंबले ने गेंद से ऑस्ट्रेलिया को नाचना सिखा दिया।
सीरीज़ में उन्होंने 24 विकेट लिए, भारत के सबसे कामयाब गेंदबाज़ बने, और टीम ने इतिहास रच दिया ..
ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज़ 1-1 से ड्रॉ,
पहली बार इतने आत्मविश्वास के साथ।
वो जीत से भी बढ़कर थी —
वो थी “सम्मान की बराबरी।”

आज जब कोई पूछे —
“गांगुली क्यों ‘दादा’ कहलाते हैं?”
तो जवाब यही है..
क्योंकि उन्होंने सिर्फ़ मैच नहीं,
अपने खिलाड़ियों पर भरोसा जताया था।

यह होता है असली कप्तान !!
ऐसे हि 2003 के वर्ल्ड कप के लिए जवागल श्रीनाथ को रिटायरमेंट से वापस बुला कर अफ्रीका ले गए थे ।।

और अनिल कुंबले?
वो फिर साबित कर गए —
जहाँ मेहनत, जुनून और कप्तान का विश्वास साथ हो…
वहाँ विदेशी पिच भी घर जैसी लगने लगती है।

क्या आप भी मानते हो कि सौरव गांगुली जैसा कप्तान भारत को कभी नहीं मिलेगा ??

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ताकि इस तरीके की जानकारी से आपको रूबरू होने का मौका मिल सके.

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