Survey Sports

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समस्त प्रकार के खेल कूद व फिटनेस के सा?

12/09/2025

Celebrating my 7th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉

18/07/2025

दोस्तों,ये हमारी शॉप सर्वे स्पोर्ट्स के इंस्टाग्राम और यू ट्यूब चैनल का QR कोड है।
रिक्वेस्ट है कि इन चैनल्स को सब्सक्राइब करें,लाइक करें और शेयर भी करें।
एडवांस में थैंक्स

Photos from Survey Sports's post 29/11/2024
01/11/2024

मोदी और योगी जितना चाहे शोर मचा लें कि "बंटोगे तो कटोगे" पर हिन्दू खुद अपनी किस्मत मिटाने पर तुला हो तो कोई क्या करेगा।
सही बात तो ये हैं कि कथित सवर्ण हिन्दू और उसमें भी सिंधी और पंजाबी अपने मिटने का खुद जिम्मेदार है।
उसे सिर्फ पैसे से मतलब है।
यही सवर्ण हिन्दू था जो अफगानिस्तान से भागा, पाकिस्तान से भागा, बंगलादेश से भाग रहा है क्योंकि वो सिर्फ पैसे के पीछे भागा,और पैसा उन्हें छोड़ का भाग गया।
यही हाल आज भी है।
इससे तो अपना विश्व का सबसे बड़ा त्यौहार दीपावली भी नही मनाया जाता।
ससुरों से एक दिन के लिये दुकान बंद नही की जाती।
बहाना क्या,अरे यार हमारा घर पर मन नही लगता।
अरे यार जब तुमने यारी दोस्ती, नाते रिश्तेदारी, परिवारीजन सब छोड़े तो मन कहाँ लगेगा।
हमसे लाख गुना अच्छा तो वो समाज है जिसे हम आने से छोटा मानते हैं।
वो आजतक कहीं से नही भागा बल्कि इकट्ठे होकर हर मुसीबत का सामना किया और जीते।
साले हम अपना त्यौहार तो बचा नही पा रहे और खुद को बचाएँगे?
जब हम किसी के साथ ही नही तो अकेले ही तो कटेंगे।

कटने की अग्रिम शुभकामनाएं।
ईश्वर आपको बिना दर्द कटने की शक्ति प्रदान करे।

21/10/2024

मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि दुनिया में ‌जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है, वह ना तो हमसे पहले किसी पीढ़ी ने देखा है और ना ही हमारे बाद किसी पीढ़ी के देखने की संभावना लगती है।

हम वह आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखें हैं.बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है और असंभव लगने वाली बहुत सी बातों को संभव होता देखा है.

● हम वो आखिरी पीढ़ी हैं

जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।

● हम वो आखिरी लोग हैं…

जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, लँगड़ी टांग, आइस पाइस, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे, सितोलिया जैसे खेल खेले हैं।

● हम वो आखिरी पीढ़ी के लोग हैं

जिन्होंने चिमनी , लालटेन, कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और चादर के अंदर छिपा कर नावेल पढ़े हैं।

● हम उसी पीढ़ी के लोग हैं…

जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं और उन ख़तो के पहुंचने और जवाब के वापस आने में महीनों तक इंतजार किया है।

● हम उस आखिरी पीढ़ी के लोग हैं

जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है। और बिजली के बिना भी गुज़ारा किया है।

जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।

जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी, किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये है। तख़्ती पर सेठे की क़लम से लिखा है और तख़्ती घोटी है।

जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है. और घर में शिकायत करने पर फिर मार खाई है

जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे. और समाज के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे।

जिन्होंने अपने स्कूल के सफ़ेद केनवास शूज़ पर, खड़िया का पेस्ट लगा कर चमकाया हैं

जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगाकर शेव बनाई है जिन्होंने गुड़ की चाय पी है। काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है और कभी कभी तो नमक से या लकड़ी के कोयले से दांत साफ किए हैं।

जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो, बिनाका गीत माला सुनी है

26/09/2024

वर्तमान के क्रिकेटर कितने बलिष्ठ लगते हैं ना! जिम में तराशी हुई काया वाले- भुजबल! टैटूधारी! उन्हें जैसे लम्बे छक्के लगाने के लिए ही सिरजा गया है। पर जो पुराना क्रिकेटप्रेमी किसी कृशकाय के नफ़ीस कवर ड्राइव पर मर मिटा हो, उसका क्या?

मुझे याद है मेरे समय का सबसे ख़तरनाक- गेंदबाज़ों में ख़ौफ़ पैदा कर देने वाला बल्लेबाज़- सचिन तेंडुलकर किसी ख़रगोश सरीखा मासूम था। आवाज़ उसकी लड़कियों जैसी थी। जब वो आया तब बाली उमर का था और सबको लगता था वो और बड़ा होगा तो आवाज़ मर्दानी हो जायेगी। पर वो कभी बड़ा नहीं हुआ। जिस उम्र में वो खेलने आया था, उससे अधिक बरस खेलकर जब वो​ रिटायर हुआ, तब भी नहीं। उसकी क़दकाठी ऐसी गोलमटोल थी कि मानों अभी पूरणपोली खाकर आया हो- कढ़ीचट मराठी! लेकिन तेंदुए-सा चपल! जब वो लपककर चौका लगाता था तो नब्बे के दशक का आत्मविश्वास-विहीन भारत झूम उठता था। सचिन की सफलता को अपनी सफलता समझ लेने वाली एक पीढ़ी अब उम्र के चौथे दशक में चली आई है- दैन्य के उन दिनों को दिल में बसाये।

जवागल श्रीनाथ जब नया-नया आया था, तब उसके कंधे की हड्डियाँ दीखती थीं। चन्द्राकार हँसुली! गेंद फेंकने के बाद वह हाँफने लगता। एक अल्पपोषित भारत का गोलंदाज़, पर स्विंग का सरताज। अनिल कुम्बले एकदम शुरू में चौड़ी फ्रेम का चश्मा पहनता था, बाद में उसने लेंस लगा लिए। वह स्पिनर कम और इंजीनियर ज़्यादा लगता था। सौरव गांगुली भी चश्मीश ही था। देह में उसकी आलस भरा था। ज़्यादा दौड़ना न पड़े इसलिए वह चौके लगाने में विश्वास रखता था। पैर उसके क्रीज़ में धँसे रहते, पर हरी घास वाली पिचों पर लहराती गेंदों को वह ऑफ़साइड में यों खेलता, जैसे कोई नींद में ही उठकर चौके में पानी पीने चला जाता हो। अज़हर छरहरा था, जिसको कि अंग्रेज़ी में कहते हैं- टॉल एंड लैंकी। बहुत ही चुस्त क्षेत्ररक्षक, पर वो क़तई बलिष्ठ न था। राहुल द्रविड़ किसी सॉफ़्टवेयर कम्पनी का व्हाइट-कॉलर एम्प्लायी लगता था। लक्ष्मण अध्यापकों सरीखा। वीरेन्दर सहवाग- जैसे गेहूँ के गोदाम का सेठ!

तब प्रवीण आमरे और सुब्रत बनर्जी की तो बात ही रहने दें। डब्ल्यू.वी. रमन हमेशा उनींदा ही रहा। 1992 में ऑस्ट्रेलिया से पिटकर भारतीय टीम दक्षिण अफ्रीका गई, वहाँ भी पिटी। जिम्बॉब्वे में हारते-हारते बची। तब सब कहते थे- 'हरारे में भारत हारा रे!' लेकिन सात एकदिवसीय मैचों की शृंखला में रमन ने शतक लगाकर जब एक मैच जिताया तो हम ख़ुशी से झूम उठे थे। तब जीत का स्वाद दुर्लभ जो था।

रवि शास्त्री ताड़ सरीखा था। झाड़ सरीखा कृष्णम्माचारी श्रीकांत। दिलीप वेंगसरकर मोहल्ले के किसी अंकल सरीखा दीखता। कपिल देव खेतों से निकलकर आया किसान। इनमें से कोई पहलवान नहीं था। कोई मैचो नहीं था। कोई बॉडी-बिल्डर नहीं। क्रिकेट खेलने के लिए शरीर-सौष्ठव तब पहली शर्त नहीं थी, नैसर्गिक प्रतिभा थी। और ये सब निसर्ग के धनी थे। अभ्यास से तपे। लाल गेंद से खेलने वाले। दुनिया के सबसे ख़ूंख़्वार गोलंदाज़ों का चुपचाप सामना करते। आउट होने पर सिर झुका लौट जाने वाले विनयी और भलेमानुष।

जिन्होंने उस दौर को देखा है और हताशा से भरे अपने जीवन को क्रिकेट में यदा-कदा मिलने वाली जीत के उल्लास से भरा है- उनके लिए ये नाम अविस्मरणीय हैं।

ज़माना बदलेगा, नए लोग आएँगे, ताक़त की तूती बोलेगी। गेंद और बल्ले के खेल में गेंद को वनवास दे दिया जायेगा। बल्ले की सिंहासन पर प्रतिष्ठा की जायेगी। शरीर-सौष्ठव प्रतिस्पर्धा से निकलकर आए नव-भुजंग लठैतों की तरह बल्ला भाँजेंगे और अहंकार के साथ गेंद को सीमारेखा के पार जाते हुए देखेंगे। पर जिसके मन में परिश्रम, संकोच, निष्ठा और नैसर्गिकता से भरी वो भारतमूर्तियाँ बस गईं, उनको वो छू भी नहीं सकेंगे।

मैं कहता हूँ- पराजय और दैन्य में कुछ सुन्दर है, शुभ है। विजय और वर्चस्व में कुछ असुन्दर, अशालीन।

और हाँ, ईश्वरों के नाम का उद्घोष बंद करो! क्रिकेट का ईश्वर एक ही है। वह भारत के लिए टेस्ट मैचों में चौथे क्रम पर बल्लेबाज़ी करने आता था, वो वनडे में ओपनिंग किया करता था। वह समकोण से भी सीधा स्ट्रेट ड्राइव खेलता था। उसके पिता का नाम रमेश था, शिक्षक का नाम रमाकांत। इससे अधिक परिचय देना ठीक नहीं!

24/09/2024

*देश के घर घर में चर्बी बीफ युक्त घी का ही दीपक जल रहा है*

जब तिरुपति के प्रसाद में मछली के तेल और बीफ की खबर आई तो सबसे पहले मेरा ध्यान आज से 2 साल पहले एक मित्र के साथ हुई टेलिफोनिक चर्चा पर गया । मेरे एक मित्र जो पूजा पाठ करते हैं उन्होंने मुझसे कहा था कि कोहली जी कभी साठ सत्तर रुपए वाले बाजारू घी से पूजा मत करना । आपने देखा होगा अक्सर गांव देहात और पूरे देश में पूजा की दुकानों पर साठ रुपए सत्तर रुपए पाव वाला एक घी बिकता है । इस घी पर ब्रैंड नेम कोई भी हो सकता है लेकिन इसकी सस्ती कीमत ही बता देती है कि ये पूजी वाला कथित घी है । हिंदू अपने पैसे बचाने के लिए साठ रुपए प्रति पाव का ये घी खरीद लाता है । जबकि सबको पता है कि ढाई सौ रुपए किलो घी तो कहीं मिल ही नहीं सकता है । साफ है कि ये कथित पूजा वाला घी नहीं बल्कि इसमें जानवरों की चर्बी ही है । लेकिन पूरे देश में यही पूजा वाला कथित घी घर घर में खरीदा जा रहा है। इसी चर्बी वाले घी से बाकायता भगवान की आरती हो रही है और दीपक भी जलाया जा रहा है ।

मैं रोज हवन करता हूं । चाहे पैसा हो या ना हो लेकिन कभी ये चर्बी वाला घी घर पर नहीं लाता हूं । मेरी आदत है कि मैं अगर घी नहीं होगा तो घी समिधा में नहीं डालूंगा ये चर्बी वाला कथित पूजा वाला घी कभी समिधा में नहीं डालता हूं । इसकी जगह पर अगर दीपक भी जलाना हो तो तिल के शुद्ध तेल का दीपक जलाता हूं ।
वेसे भी घी हम अपने घर मे ही बनाते हैं क्योकि अब हमें घर वाली मलाई नही देती।
इसी घी से हवन होता है और जोत भी जलाई जाती है।

अगर आपके पास पैसा है तो आप मार्केट से अच्छा घी खरीद सकते हैं लेकिन उस घी की कीमत एक हजार रुपए से ज्यादा होगी प्रति किलोग्राम । आम तौर पर हिंदू माइंड सेट ये है कि खुद के लिए तो अच्छा देसी घी रख लें और भगवान को चर्बी वाले घी का भोग लगा देंगे । इस आदत को सुधारना होगा और ये साठ रुपए वाला घी ना सिर्फ जनता त्याग दे बल्कि सरकार भी इस पर प्रतिबंध लगाए ।

जहां तक बात तिरुपति मंदिर के प्रसाद की है तो इस बात पर तो किसी को शक नहीं होना चाहिए कि तिरुपति देश के सबसे धनी मंदिरों से एक है । पांच सौ करोड़ का तो यहां हर साल प्रसाद ही बिक जाता है । दान दक्षिणा और चढावा तो हजारो करोड़ में है । अगर तिरुपति चाहे तो खुद भी अपनी एक गौशाला खोलकर सैकड़ों कर्मचारियों को रखकर शुद्ध देसी घी पूरे देश के मंदिरों में सप्लाई कर सकता है इससे देश के हजारों लोगों को रोजगार भी मिल सकता है । लेकिन इस तरफ नहीं सोचा गया ।

वृंदावन और मथुरा के तमाम ऐसे मंदिर हैं जहां धन नहीं है फिर भी उनकी खुद की गोशाला है जिसमें भक्त दान दक्षिणा देते हैं और वहीं के देसी शुद्ध घी से कान्हा को प्रसाद चढ़ता है । वृंदावन के मंदिरों से हम सभी सीख सकते हैं । मंदिरों के पास चढावा अरबों रुपए का है । इनको सरकारी नियंत्रण से मुक्त होना चाहिए और मंदिर कमेटी को चाहिए कि धन का उपयोग हिंदुओं की शिक्षा दीक्षा और रोजगार पर खर्च कर दिया जाए । इससे पूरे देश को लाभ हो सकता है ।

लेकिन हिंदू एक नंबर की लालची कौम है । मैं आप जैसे अपवाद हिंदुओं की बात नहीं कर रहा हूं । अधिकतर हिंदू ऐसे ही होते हैं । हिंदू बदल गया है । पहले ऐसा नहीं था । मुझे आज भी याद है कि हाथरस के पास एक गांव में एक बाबा जी ने कभी भी किसी गाय को नहीं बेचा था । बल्कि बूढी होने पर गाय उनके खूंटे पर ही मरी । सालों साल गाय ने दूध नहीं दिया फिर भी बाबा जी गाय को पालते रहे । लेकिन आज क्या हो रहा है देखिए यूपी में योगी आदित्यनाथ ने गोहत्या पर सख्ती से प्रतिबंध क्या लगाया हिंदुओं की बेशर्मी खुलकर सामने आ गई । अगर आप यूपी के रहने वाले हैं तो जानते होंगे कि यूपी में लोग दूध ना देने वाली गायों को खुल्ला छोड़ दे रहे हैं । सड़कों पर मवेशियों की बाढ आई हुई है जिसकी वजह से खूब दुर्घटनाएं हो रही हैं । यही खुले मवेशी किसानों का भी नुकसान कर रहे हैं । योगी जी ने तो ये स्कीम भी निकाल दी है कि हर गांव में गोशाला हो और आवारा पशुओं की सेवा हो लेकिन उसमें भी हिंदू पैसा मार ले रहा है । बताओ ऐसे हिंदू का कल्याण आखिर कैसे हो सकता है

दुख के साथ कहता हूं कि अधिकांश वृद्धाश्रमों में आपको हिंदू लोग ही भरे पड़े मिलेंगे । आपको वृद्धाश्रमों में एक भी मुसलमान नहीं मिलेगा । क्योंकि मुसलमान कितना भी बुरा हो लेकिन अपने मां बाप की इज्जत खूब करता है अपनी बीवी से पहले बेटा यहां अपनी मां का हाल चाल पूछता है लेकिन दूसरी तरफ अधिकांश हिंदू बहुत जल्दी ना सिर्फ अपनी बीवी के गुलाम बन जाते हैं बल्कि बहुत जल्द ही अपने मां बाप को भी वृद्धाश्रम भेज कर हर महीने कुछ पैसे बचा लेने की जुगत में लगे रहते हैं । ध्यान रहे मैं हर हिंदू की बात नहीं कर रहा हूं बहुत सारे लोग अच्छे भी होते हैं । अब सोचो कि जो हिंदू अपने मां बाप का नहीं गोमाता का नहीं कि वो भारत माता का और इस देश का क्या होगा ।

15/09/2024

मैं कट्टर बीजेपी समर्थक हूँ, सक्रिय कार्यकर्ता हूँ पर मोदी जी के कार्यकाल में मुसलमान जितना भारत भर में फैला है, उतना 70 सालो में किसी भी कार्यकाल में नही फैला।
हो सकता है मैं गलत होऊं पर मुझे लगता है हिन्दू द्रोही गद्दार कांग्रेस नही मोदी है

15/08/2024

सॉरी
देश के तीन टुकड़े करवा कर और लाखों हिंदुओं को मरवा कर मिली इस कथित आज़ादी की ना तो कोई बधाई और ना ही खुशी।
वेसे भी तीनो टुकड़ों में हिंदुओं को मिला ही क्या है

06/08/2024

बेटियों को बिगाड़ने में अक्सर मां का प्रमुख योगदान होता है, ना कि पिता का। दुनियाभर में कोई भी पिता यह नहीं चाहेगा कि उसकी बेटी छोटे कपड़े पहने, हॉट दिखे, और अपने अंगों का प्रदर्शन करे। यह माताओं का ही दिल और उनकी ममता होती है जो बेटियों को अर्धनग्न, हॉट और खूबसूरत दिखने का रास्ता बताती हैं, ताकि वे सबसे सुंदर दिखें।

ऐसी माताओं को मैं प्रणाम करता हूं और उन्हें यह बताना चाहता हूं कि लड़कियां भरे पूरे कपड़ों में जितनी सुंदर लगती हैं, आधे छोटे कपड़ों में उतनी ही वैश्या जैसी दिख सकती हैं।

शायद अज्ञानता की वजह से उन्होंने अपनी बच्चियों को यह नहीं सिखाया कि एक औरत मर्यादा में अच्छी लगती है और उनकी मर्यादा होती है पर्दा, ना कि नग्नता। शायद आपकी मां ने भी आपको यही सिखाया इसलिए आपने अपनी बच्ची को पर्दा नहीं सिखाया।

मेरी यह बात कुछ महिलाओं को बुरी लग सकती है, लेकिन मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि दुनिया में ऐसी कौन सी बेटी है जो अपनी मां से अपनी प्राइवेट बातें शेयर नहीं करती?

हर बेटी अपनी मां से अपनी निजी बातें शेयर करती है, ना कि पिता से। चाहे वह पहली पीरियड्स की बात हो, प्रेग्नेंसी की बात हो, ससुराल की बातें हों, रिश्तों की बातें हों, या छोटे कपड़े पहनकर हॉट और जवान दिखने की बातें हों। सभी पर आप उन्हें राय देती हैं और अपनी प्रतिक्रिया देती हैं। तो बेटियों को यह क्यों नहीं सिखातीं कि वे भरे पूरे कपड़ों में भी सुंदर दिखती हैं? हमारा संस्कार और सभ्यता यह नहीं कहते कि हम छोटे कपड़े पहनें, जिससे हमारी और हमारे समाज की बदनामी हो।

बेटी को यह समझाने के बजाय कि मर्दों की सोच खराब है, उसे सिखाएं कि वह भरे पूरे कपड़ों में भी सुंदर दिखती है। आज हमारे देश में कुछ माताओं के कारण देश की संस्कृति मिट्टी में मिल रही है और कुछ देश हमारी ही संस्कृति अपनाकर खुद को अच्छे माहौल में परिवर्तित कर रहे हैं।

हमारे देश की बहु-बेटियां अर्धनग्न होती जा रही हैं। दूसरे देश की बात छोड़िए, मैं अपने ही देश की बात करता हूं।

वो महज चार साल की उम्र में वे अपने बच्चों को पूरे कपड़े पहनने सिखाते हैं, और हम अपने बच्चों को डांस क्लास भेजते हैं। वे अपनी बेटियों को नमाज की अदा सिखाते हैं, और हम अपनी बच्ची को अंग्रेजी सिखाते हैं। वे अपनी बेटियों को सिखाते हैं पर्दे और हिजाब के फायदे, और हम अपनी बेटियों को हॉट शॉर्ट्स पहनना सिखाते हैं। वे अपनी बेटियों को नवाज, रोजे और संघर्ष से लड़ना सिखाते हैं, और हम अपनी बेटियों को फास्टिंग, धर्मकांड और रामायण जैसी ग्रंथों से दूर रखते हैं।

यहां गलती किसी पिता या पति की नहीं बल्कि मां की है। कोई पिता कभी नहीं चाहेगा कि उसकी बेटी अर्धनग्न कपड़ों में रहे। पिता तो वह हीरा है जो आपकी हर ख्वाहिश को पूरा करता है और पति वह भोला-भाला इंसान है जिसे महिलाएं शादी से पहले सस्ते दामों में खरीद लेती हैं और उस पर हुक्म चलाती हैं।

इसलिए महिलाओं से अनुरोध है कि आधुनिकता में अपनी बेटियों को छूट न दें, बल्कि उन्हें धर्म और संस्कृति की जानकारी दें। उन्हें छोटे कपड़े पहनने से रोकें। भरे पूरे कपड़ों में भी लड़कियां बहुत सुंदर दिखती हैं।

लेख पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद।

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