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Read - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव् 25/08/2026

AWGP- LITERATURE GURUDEV
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा
‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है’

लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर, लम्बी चौड़ी डींग हांक कर या बड़े-बड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आशा करना व्यर्थ है। इन साधनों से थोड़ी मदद मिल सकती पर उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। युग-निर्माण जैसे महान् कार्य के लिए तो यह साधन सर्वथा अपर्याप्त और अपूर्ण हैं। इसका प्रधान साधन वही हो सकता है कि हम अपना मानसिक स्तर ऊंचा उठायें, चरित्रात्मक दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्कृष्ट बनें। अपने आचरण से ही दूसरों को प्रभावशाली शिक्षा दी जा सकती है। गणित, भूगोल, इतिहास आदि की शिक्षा में कहने-सुनने की प्रक्रिया से काम चल सकता है पर व्यक्ति निर्माण के लिए तो निखरे हुए व्यक्तित्वों की ही आवश्यकता पड़ेगी। उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सबसे पहले हमें स्वयं ही आगे आना पड़ेगा। हमारी उत्कृष्टता के सन्दर्भ में संसार की श्रेष्ठता अपने आप बढ़ने लगेगी। हम बदलेंगे तो युग भी जरूर बदलेगा और हमारा युग-निर्माण संकल्प भी अवश्य पूर्ण होगा।

क्रमशः ........
-LITERATUREGURUDEV .

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25/08/2026

अस्वाद व्रत — जीभ पर संयम
क्या हम भोजन शरीर की आवश्यकता के लिए करते हैं, या केवल जीभ के स्वाद के लिए?

Read - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव् 24/08/2026

AWGP- LITERATURE GURUDEV
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा
‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है’

अपने को उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न किया जाय तो हमारे सम्पर्क में आने वाले दूसरे लोग भी श्रेष्ठ बन सकते हैं। आदर्श सदा कुछ ऊंचा रहता है और उसकी प्रतिकृति कुछ नीची रह जाती है। आदर्श का प्रतिष्ठापन करने वालों को सामान्य जनता के स्तर से सदा ऊंचा रहना पड़ता है। संसार को हम जितना अच्छा बनाना और देखना चाहते हैं उसकी अपेक्षा कहीं ऊंचा बनने का आदर्श उपस्थित करना पड़ेगा। उत्कृष्टता की श्रेष्ठता उत्पन्न कर सकती है। परिपक्व शरीर की माता ही स्वस्थ बच्चे का प्रसव करती है। आदर्श पिता बनें तो ही सुसन्तति का सौभाग्य प्राप्त कर सकेंगे।
हम आदर्श गुरु हों तो हमें श्रेष्ठ शिष्यों की श्रद्धा का लाभ मिलेगा। यदि आदर्श पति हों तो ही पतिव्रता पत्नी की सेवा प्राप्त कर सकेंगे। शरीर की अपेक्षा छाया कुछ कुरूप ही रह जाती है। चेहरे की अपेक्षा फोटो में कुछ न्यूनता ही रहती है। हम अपने आप को जिस स्तर तक विकसित कर सके होंगे, हमारे समीपवर्ती लोग उससे प्रभावित होकर कुछ ऊपर तो उठेंगे, तो भी अपनी अपेक्षा कुछ नीचे रह जावेंगे। इसलिए हम दूसरों से जितना सज्जनता और श्रेष्ठता की आशा करते हों, उसकी तुलना में अपने को कुछ अधिक ही ऊंचा प्रमाणित करना होगा। हमें हर चन्द यह याद रखे रहना होगा कि उत्कृष्टता के बिना श्रेष्ठता उत्पन्न नहीं हो सकती।

क्रमशः ........
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Read - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव् हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन ....

24/08/2026

क्या तुम वास्तव में वही हो, जो ईश्वर ने तुम्हें बनाया है?
आज स्वयं से पूछिए—क्या मैं वही हूँ, जो मुझे वास्तव में होना चाहिए?

23/08/2026

Have we ever asked ourselves, “What am I doing for my soul?” Have you wondered, God does not count only the number of mantras we repeat. God observes the sincerity, purity and surrender behind them? Can worship be considered successful if it does not transform the worshipper?

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Read - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव् 22/08/2026

AWGP- LITERATURE GURUDEV
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*
*‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है’*

नव दुर्गाओं की नव-रात्रियों में हम हर साल पूजा करते हैं कि वे अनेक ऋद्धि-सिद्धियां प्रदान करती हैं। सुख सुविधाओं की उपलब्धि के लिए उनकी कृपा और सहायता पाने के लिए विविध साधन पूजन किये जाते हैं। जिस प्रकार देवलोक में निवासिनी नव दुर्गायें हैं उसी प्रकार भू-लोक में निवास करने वाली, हमारे अत्यन्त समीप—शरीर और मस्तिष्क में रहने वाली—नौ प्रत्यक्ष देवियां भी हैं और उनकी साधना का प्रत्यक्ष परिणाम भी मिलता है। देवलोक वासिनी देवियों के प्रसन्न होने और न होने की बात तो संदिग्ध हो सकती है पर शरीर लोक में रहने वाली इन देवियों की साधना का श्रम कभी भी व्यर्थ नहीं जा सकता। यदि थोड़ा भी प्रयत्न इनकी साधना के लिए किया जाय तो उसका भी समुचित लाभ मिल सकता है। हमारे मनःक्षेत्र में विचरण करने वाली इन नौ देवियों के नाम हैं:—
(1)आकांक्षा (2)विचारणा (3)भावना (4)श्रद्धा (5)प्रवृत्ति (6)निष्ठा (7)क्षमता (8)क्रिया (9)मर्यादा। इनका संतुलित विकास करके मनुष्य अष्ट-सिद्धियों और नव-निद्धियों का स्वामी बन जाता है। संसार के प्रत्येक प्रगतिशील मनुष्य को जान या अनजान में इसकी साधना करनी ही पड़ती है और इन्हीं के अनुग्रह से उन्हें उन्नति के उच्च शिखर पर चढ़ने का अवसर मिला है।

क्रमशः ........
-LITERATUREGURUDEV .

Read - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव् हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन ....

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