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Photos 28/04/2022
Photos from KVS Sports Club's post 16/04/2022

Meet Avneet Kaur Siddhu
She has been recently appointed at SSP rank in Punjab based upon her carrier achievements in shooting sports.

17/09/2021
22/08/2021

नीचे चित्र मे जो है इसे #आर्मी_साइकल कहा जाता है।
ये साइकल हल्के वजन की और इसके टायर ऐसे हैं कि किसी भी तरह के रास्ते पर आसानी से चल सकें और पंचर होने का सवाल ही नहीं।

द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सेना के सबसे बड़े बेस सिंगापुर, जिसे पूर्व का जिब्राल्टर कहा जाता था, पर जापानी हमले की आशंका थी।

अंग्रेज बहुत सयाने थे, उन्होंने यहाँ अपने कुछ सौ सैनिकों के साथ बड़ी तादाद में अपने गुलाम देशों की सेना सिंगापुर में तैनात की थी, जिसमें करीब 40-45 हजार भारतीयों को ब्रिटिश इंडियन आर्मी के नाम से और ऑस्ट्रेलियाई, अफ्रीकी सेना भी हजारों की संख्या में थी।
मिलिट्री बेस की दूसरी ओर घना जंगल था जहाँ से किसी भी तरह के हमले की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, क्योंकि वो जंगल इतना घना था कि वहाँ से टैंक या सेना किसी भी तरह के सेना के वाहन का आना असंभव था, इसलिए ब्रिटिश सेना ने उस जंगल की ओर सुरक्षा के इंतजाम न के बराबर किये थे, या नहीं किये थे।
मजे की बात ये है कि 1942 में फरवरी के महीने में चले इस युद्ध में जापान ने ब्रिटिश सेना को सामने से युद्ध मे उलझाए रखा और अचानक पीछे जंगल से इस आर्मी साइकिलों पर सवार हजारों जापानी सेनिको ने हमला बोल दिया।
पीछे से हुए इस हमले से निपटने के लिए ब्रिटिश सेना बिल्कुल तैयार नहीं थी, उसने सोचा भी नहीं था कि ऐसा हमला होगा।
मात्र 36 हजार जापानी सेना ने अपने से दुगनी संख्या वाली ब्रिटिश सेना को हराकर, उसके सभी सैनिकों को बंदी बना लिया।
भारतीय जवानों को छोड़ ब्रिटिश आर्मी के लिए लड़ने वाले बाकी हर देश के सैनिकों को जापानियों ने मार दिया।

नहीं, नहीं, गाँधी नेहरू के बोलने पर जापानियों ने भारतीय सैनिको की जान नहीं बख्शी, बल्कि जापान की ब्रिटेन से बिल्कुल नहीं जमती थी और महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस जापान के सहयोग से भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों से आजाद हिंद सेना बनाकर संघर्ष कर रहे थे....
इसलिए रास बिहारी जी के कहने पर जापान ने भारतीय सैनिको को नहीं मारा। 35-40 हजार ब्रिटिश आर्मी के उन हिन्दू जवानों को रास बिहारी बोस ने अंग्रेजों के लिए लड़ने की बजाय माँ भारती की आजादी के लिए लड़ने के लिए न सिर्फ प्रेरित किया, बल्कि उन सबकी भर्ती आजाद हिंद सेना में करवाई।

1943 में आजाद हिंद सेना की बागडोर नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सँभाली और अपनी सेना से ब्रिटिश सेना का जबरदस्त नुकसान किया।
द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन पूरी तरह पस्त हो गया, उसकी बहुत बड़ी मानव और वित्त हानि हुई, उसका इतना बुरा हाल हुआ कि अपने गुलाम देशों पर नियंत्रण रखने के लिए उसके पास संसाधन और मनुष्य बल कम पड़ गया।
ऊपर से आजाद हिंद सेना के जवान अंग्रेजों की सेना को इतना नुकसान पहुँचाने लगे कि अंग्रेजों का भारत पर नियंत्रण रखना असंभव हो गया था।

1945 में नेताजी की अचानक हुई अकाल मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने राहत की साँस ली पर आजाद हिंद सेना को भारतीय जनता के मिले भरपूर समर्थन से अंग्रेज भी घबरा गए, वे समझ गए कि अब भारत पर राज करना मतलब अपनी मृत्यु को दावत देना है। मजबूरन द्वितीय विश्वयुद्ध के खत्म होने के एक डेढ़ साल के भीतर उन्हें भारत समेत कई देशों को छोड़ना पड़ा।

बताया जाता है कि अंग्रेजों और आजाद हिंद सेना के संघर्ष में 27 हजार से ज्यादा भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए थे और हमें पढ़ाया गया कि "दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।"
बड़ी बात शायद कम लोगों को पता होगी कि देश के लिए इतना बड़ा संघर्ष करने वाले रास बिहारी और नेताजी की संतानें आज भी जापान में रहती हैं, गुमनाम जिंदगी, जिन्हें शायद ही कोई जानता होगा।
जिन संतानों को हमें गले लगाकर, सिर आँखों पर बैठाना था उन्हें आज कोई नहीं जानता।

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धन्यवाद

19/08/2021

*टोक्यो ओलम्पिक* की *2 महान घटनाएं* जो *स्वर्णिम इतिहास* बन गईं
- एक बार *जरूर पढ़ें* और *अच्छा* लगे तो *अमल* करते हुए आगे *सम्प्रेषित* करें
🙏
*पहली घटना*
🙇🏻‍♂️
*केनिया* के सुप्रसिद्ध धावक *अबेल मुताई* आलंपिक प्रतियोगिता में *अंतिम राउंड* में दौडते वक्त *अंतिम लाइन से कुछ मीटर ही दूर थे* और उनके *सभी प्रतिस्पर्धी पीछे* थे।
*अबेल ने स्वर्ण पदक लगभग जीत ही लिया था...* इतने में कुछ *गलतफहमी* के कारण वे *अंतिम रेखा* समझकर *एक मिटर* पहले ही *रुक गए।*

*उनके पीछे आनेवाले स्पेन के इव्हान_फर्नांडिस के ध्यान में आया कि अंतिम रेखा समझ नहीं आने की वजह से वह पहले ही रुक गए।*

*उसने चिल्लाकर अबेल को आगे जाने के लिए कहा लेकिन स्पेनिश नहीं समझने की वजह से वह नही हिला।*

*आखिर मे इव्हान ने उसे धकेल कर अंतिम रेखा तक पहूंचा दिया ।*

*इस कारण अबेल का प्रथम तथा इव्हान का दूसरा क्रमांक आया।*
🙏
*पत्रकारों ने इव्हान से पूछा तुमने ऐसा क्यों किया ?*
🙇‍♂️
*मौका मिलने के बावजूद तुमने प्रथम क्रमांक क्यों गंवाया ?*
🙇‍♂️
*इव्हान ने कहा "मेरा सपना है कि हम एक दिन ऐसी मानवजाति बनाएं जो एक दूसरे को मदद करेगी ना कि उसकी भूल से फायदा उठाएगी।*
🙇‍♂️
*मैने प्रथम क्रमांक नहीं गंवाया।*
🙇‍♂️
*पत्रकार ने फिर कहा लेकिन तुमने कीनियाई प्रतिस्पर्धी को धकेलकर आगे लाए ।*
🙇‍♂️
*इस पर इव्हान ने कहा "वह प्रथम था ही, यह प्रतियोगिता उसी की थी।"*
🙇‍♂️
*पत्रकार ने फिर कहा " लेकिन तुम स्वर्ण पदक जीत सकते थे" "तुम समझते हो उस जीतने का क्या अर्थ होता।*
🙇‍♂️
*मेरे पदक को सम्मान मिलता ?*
🙇‍♂️🙏🙇‍♂️
*मेरी मां ने मुझे क्या कहा होता ? - संस्कार एक पीढी से दूसरी पीढी तक आगे जाते रहते है।*
🙇‍♂️
*मैने अगली पीढी को क्या दिया होता ?*

*"दूसरों की दुर्बलता या अज्ञान का फायदा न उठाते हुए उनको मदद करने की सीख मेरी मां ने मुझे दी है।"*
🙇‍♂️🙏🙇‍♂️
🙏
*दूसरी घटना* -

*टोक्यो ओलंपिक में पुरुषों की हाई जम्प फाइनल।*

*फाइनल में इटली के जियान मारको टेम्पबरी का सामना क़तर के मुताज़ इसा बर्शिम से हुआ।*

*दोनों ने 2.37 मीटर की छलांग लगाई और बराबरी पर रहे !*

*उसके बाद ओलंपिक अधिकारियों ने उनमें से प्रत्येक को तीन और प्रयास दिए...*

*लेकिन वे 2.37 मीटर से अधिक तक नहीं पहुंच पाए।*

*उन दोनों को एक और प्रयास दिया गया, लेकिन उसी वक़्त टाम्पबेरी पैर में गंभीर चोट के कारण अंतिम प्रयास से पीछे हट गए।*

*ये वो क्षण था जब मुताज़ बरशिम के सामने कोई दूसरा विरोधी नहीं था औऱ उस पल वह आसानी से अकेले सोने को जीत सकते थे !*

*लेकिन बर्शिम के दिमाग में कुछ घूम रहा था औऱ फ़िर कुछ सोचकर उसने एक अधिकारी से पूछा...*

*"अगर मैं भी अंतिम प्रयास से पीछे हट जाऊं तो क्या हम दोनों के बीच गोल्ड मैडल साझा किया जा सकता है ?"*

*कुछ देर बाद एक आधिकारी जाँच कर पुष्टि करता है और कहता है "हाँ बेशक गोल्ड आप दोनों के बीच साझा किया जाएगा"।*

*बर्शिम के पास और ज्यादा सोचने के लिए कुछ नहीं था ।*

*उसने आखिरी प्रयास से हटने की घोषणा की।*

*यह देख इटली का प्रतिद्वन्दी ताम्बरी दौड़ा और मुताज़ बरसीम को गले लगा कर चिल्लाया !*
*दोनों भावुक होकर रोने लगे।*
🙏🙇‍♂️🙏
*लोगों ने जो देखा वह खेलों में प्यार का एक बड़ा हिस्सा था जो दिलों को छूता है।*
🙏
*यह अवर्णनीय खेल भावना को प्रकट करता है जो धर्मों, रंगों और सीमाओं को अप्रासंगिक बना देता है !!!*

*इंसान का किरदार किसी भी मैडल से बड़ा है ।*

🙏🙇‍♂️🙏

08/08/2021



In 1984, when Neeraj Chopra's German coach Uwe Hohn used to play, he threw a javelin of 104.8 meters, which almost reached the spectator's gallery, after which the design of the javelin was changed to not make such a long throw but again they began to hit 90 meters. Uwe Hohn was the only athlete who made 100+ throw. ❤️

📷 : Uwe Hohn in 1984 Olympic

07/08/2021

India’s 🇮🇳 Olympics Medals (by editions)

1896🥈🥈
1928🥇
1932🥇
1936🥇
1948🥇
1952🥇🥉
1956🥇
1960🥈
1964🥇
1968🥉
1972🥉
1980🥇
1996🥉
2000🥉
2004🥈
2008🥇🥉🥉
2012🥈🥈🥉🥉🥉🥉
2016🥈🥉
2021🥇🥈🥈🥉🥉🥉🥉

Photos from KVS Sports Club's post 07/08/2021

Some inspirational moments from along with a medal tally of

07/08/2021

Next time, before you tell your kids with that little flab, : "SPORTS IS NOT FOR YOU" ,remember this girl!
Yes, you are looking at an unputdownable girl who has represented India in Olympic discuss throw event
She is Kamalpreet Kaur and its her immense mental strength, hard work and determination which makes her one of the top athlete in the world.

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Sunday 7am - 7pm