खेल की बात

खेल की बात

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खेल को देखने का बिल्कुल अलग नज़रिया

05/03/2021

टीवी पर मैच देखते हुए जो लेकर कमेंट करते हैं उन्हें मान लेना चाहिए वास्तविक स्थिति की उन्हें कोई समझ नहीं। चाहे वो वरिष्ठ खेल पत्रकार हों या फिर दिग्गज पूर्व क्रिकेटर। कल आकाश चोपड़ा ने ये बोलते-बोलते कान पका दिए कि इंग्लैंड ने टॉस का लाभ गंवा दिया है। इतनी अच्छी पिच का मेहमान लाभ नहीं उठा पाए। मैच की ताजा स्थिति से साफ है कि हालात वैसे नहीं हैं जैसा आकाश चोपड़ा या दूसरे लोग समझ रहे थे। अगर मैं गलत हूं तो फिर ये भी हो सकता है कि दोनों टीमों के बल्लेबाज खेलना ही भूल गए हों?


04/03/2021

कोविड अपने आप में घातक बीमारी नहीं है। कोविड में मृत्य दर काफी कम है। फिर भी इस बीमारी से पूरी दुनिया में लाखों लोग असमय काल की गाल में समा गए। दुनिया की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी। किसी ने नहीं कहा जो लोग कोरोना से मरे उन्हें जीना नहीं आता था। कहना भी नहीं चाहिए।
मोटेरा की पिच "बहुत अच्छी" थी। लेकिन 30 विकेट रहस्यमय तरीक़े से असमय गिर गए। "जानकार" कह रहे हैं उन्हें खेलना नहीं आया। ऐसे "जानकारों" से निवेदन है कि जो हुआ कृपया उसे समग्रता में समझने की कोशिश करें। आप खेलना नहीं जानते इसलिए आप मैदान में नहीं होते। हाथ में कलम और की-बोर्ड है तो ज़िम्मेदारी समझिए। ट्रोल मत बनिये।

04/03/2021

अंपायर कॉल को लेकर ऐसा लगता है कमेंटेटरों की समझ साफ नहीं है। जब भी अम्पायर कॉल को स्टे रखा जाता कमेटरर हिकारत भरी प्रतिक्रिया देते हैं। icc को उन्हें सख्ती से समझाना चाहिए कि क्यों 50फिफ्टी केस में अंपायर कॉल को तवज्जो दिया जाता।

02/03/2021

- बस यूं समझ लीजिए मोटेरा की 'कातिल गेंद' बल्लेबाजों के सिलेबस के बाहर की थी

- गेंद अगर दिखेगी नहीं तो टर्न करे या सीधी रहे.. क्या फर्क पड़ता है

- अहमदाबाद में जो कुछ हुआ, उसे आसान शब्दों में समझिए

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विराट कोहली, विवियन रिचर्ड्स, नैथन लॉयन, ग्रीएम स्वॉन.. फेहरिस्त लंबी है उन लोगों की जो अहमदाबाद में दो दिन से भी कम समय में नाटकीय तरीके से खत्म हुए टेस्ट के लिए बल्लेबाजों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इतने दिनों में मैंने क्रिकेटर कमेंटेटरों, ट्विटर और फेसबुक पर लिखने वाले पत्रकारों के तमाम आकलन पढ़े लेकिन मुझे ज्यादातर मुख्य समस्या से भटके हुए लगे।

एक्सपर्ट्स ने इसे हेडिंग्ली बनाम मोटेरा और सीम बनाम स्पिन, बल्लेबाज बनाम गेंदबाज की लड़ाई बनाने की कोशिश की। लेकिन मेरे ख्याल से समस्या ये नहीं है। इंग्लैंड या ऑस्ट्रेलिया में अगर बैटिंग कॉलेप्स होता है तो उसकी अपनी क्रिकेटीय वजहें होती हैं। खासकर इंग्लैंड में पिच के साथ मौसम अहम भूमिका निभाता है। इसलिए ये कह देना काफी कि इंग्लैंड में जब दो-तीन दिन में टेस्ट खत्म होता है तो कोई क्यों नहीं कुछ बोलता?

कुल लोग ये भी तर्क दे रहे कि जिस पिच पर रोहित शर्मा बैटिंग कर सकते हैं तो बाकी क्यों नहीं? ये बेहद फर्जी तर्क है। ऐसी खबरें आपने देखी और सुनी होगी कि बहुमंजिला इमारत के गिरने पर बहुत सारे लोग मर गए लेकिन दो-तीन बाद मलबे से कोई बच्चा या कोई बुजुर्ग जिंदा निकल गया। चमत्कारिक रूप से किसी के बच निकलने का मतलब ये नहीं कि मृतकों से दुर्व्यवहार किया जाए। रोहित शर्मा ने रन बना लिया तो इसका मतलब ये नहीं बाकी बेकार थे। साथ ही यहां ये भी देखना जरूरी है कि रोहित शर्मा किसी अश्विन या अक्षर पटेल के खिलाफ रन नहीं बना रहे थे। पूछिये ना उनसे जो जो रूट की गेंद पर भी गच्चा खा गए।

खैर आते हैं मुद्दे पर। अहमदाबाद के मोदी स्टेडियम में मचे हाहाकार (ध्यान दीजिए मैंने पिच नहीं लिखा क्योंकि मेरी चिंता पिच है ही नहीं) पर इतने दिनों में मुझे दो ही विश्लेषण ऐसा पढ़ने को मिला जो सच के करीब जान पड़ता है। इंडियन एक्प्रेस में देवेंद्र पांडे की स्टोरी और पत्रकार फ्रेडी वाइल्ड का ट्विटर थ्रेड। इन दोनों का लब्बोलुआब ये है कि दोष मोटेरा की पिच का नहीं बल्कि पिंक बॉल का है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक अहमदाबाद में टेस्ट के नाम पर जो कुछ हुआ उससे टीम मैनेजमेंट भी खुश नहीं है। टीम मैनेजमेंट के एक सदस्य ने अखबार को बताया, 'गुलाबी गेंद का सामना करते समय समस्या ये होती है कि गुलाबी गेंद लाल गेंद की तुलना में बहुत तेज़ी से स्किड होती है, जिसे पढ़ना मुश्किल होता है। दरअसल, लाल गेंदों का सामना करते-करते क्रिकेटर के दिमाग में एक अलग स्मृति बन जाती है। उनकी स्मृति में गेंद की रफ्तार और गेंद के व्यवाह को लेकर एक निश्चित ज्ञान दर्ज होता है। चूंकि गुलाबी गेंद लाल गेंद की तुलना में ज्यादा तेजी से आती है, इससे बल्लेबाज का अंदाजा बिगड़ जाता है। यही वजह है जिसे एक्सपर्ट सीधी और सपाद गेंद कह रहे हैं, उन गेंदों पर भी बल्लेबाज पस्त हो गए। आसान शब्दों में ये जान लीजिए कि जैसे सिलेबस से बाहर का सवाल आने पर अच्छे से अच्छा छात्र गड़बड़ा जाता है वैसे ही अहमदाबाद में जिन गेंदों पर बल्लेबाज आउट हुए वो सिलेबस के बाहर की गेंद थी। अखबार के मुताबिक यही वजह है कि खिलाड़ी डे-नाइट टेस्ट खेलने के लिए उत्सुक नहीं हैं।

जहां बड़े-बड़े पूर्व क्रिकेटर हेडिंग्ली बनाम मोटेरा और सीम बनाम स्पिन विवाद में उलझे हुए थे इंग्लैंड के कप्तान जो रूट ने समस्या को तुरंत पकड़ लिया। रूट के मुताबिक पिंक बॉल में चमक बनाए रखने के लिए इस्तेमाल होने वाला अतिरिक्त पेंट की वजह गेंद सतह पर तेजी से फिसलती है। इससे बल्लेबाजों को गेंद भांपने में मुश्किल होती है। इससे जाहिर होता है कि अहमदाबाद 'हादसे' के लिए पिच नहीं बल्कि पिंक बॉल जिम्मेदार है।

लेकिन,सवाल उठता है कि डे-नाइट टेस्ट कोई पहली बार तो नहीं हो रहा फिर अहमदाबाद में नया क्या हुआ? तो जानकारों के मुताबिक धूल वाली पिच, ओस और तापमान में गिरावट ने गुलाबी बॉल को और घातक बना दिया। टीम इंडिया के एक खिलाड़ी के मुताबिक अगर मोटेरा में लाल गेंद से टेस्ट मैच होता है तो चार दिन खिंच जाता। चेन्नई की पिच और अहमदाबाद की पिच के बीच जो लोग तुलना करते हैं, वो भूल गए कि चेन्नई में रेड बॉल से टेस्ट खेला गया और चेन्नई में पिंक ब़ॉल। इसलिए चेन्नई में खराब पिच होने के बावजूद मैच लंबा चला।

पिंक बॉल के साथ एक और दिक्कत बताई जाती है वो है काले रंग की सीम। ब्लैक सीम की वजह से बल्लेबाजों के लिए हवा में इसे पकड़ना (देखना) मुश्किल होता है। बल्लेबाजों को ये अंदाजा लगाने में दिक्कत होती है कि गेंद किधर जा रही है। जब बल्लेबाज को गेंद की दशा-दिशा का अंदाजा ही ना हो तो फिर बॉल टर्न करे या सीधी रह जाए क्या फर्क पड़ता है। वो तो बेबस होगा। आप इसे ऐसे भी समझिये। आप गाड़ी ड्राइव कर रहे हों और आगे ये पीछे की गाड़ी की रफ्तार का आपको सटीक अंदाजा ही ना हो तो क्या होगा? या तो आप ठुकेंगे या ठोकेंगे? अहमदाबाद वही हुआ। बल्लेबाजों की ठुकाई हो गई। टीम इंडिया खुशकिस्मत थी कि उसे अश्विन और अक्षर का सामना नहीं करना पड़ा,वरना विराट कोहली भी शिकायत कर रहे होते।


01/03/2021

अगर बल्लेबाज तकनीकी तौर पर दक्ष है तो हर पारी में क्यों नहीं रन बना पाता?
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गावस्कर 214 पारियों में 99 बार 25 या इससे कम के स्कोर पर आउट हुए। यानी 46% टेस्ट पारी में नाकाम रहे सनी भाई।
विवियन रिचर्ड्स 182 पारियों में 77 बार 25 इससे कम के स्कोर पर आउट हुए। यानी 42% मौके पर नाकाम रहे किंग रिचर्ड्स।
एलन बॉर्डर 265 में 117 इनिंग में 25 इससे कम के स्कोर पर आउट हुए। बॉर्डर का नाकामी प्रतिशत 44।
जेफ बॉयकॉट 193 पारियों में 84 इनिंग्स में 25 इससे कम के स्कोर पर आउट हुए। यानी 43.5% मौके पर नाकाम रहे बायकॉट।

अहमदाबाद टेस्ट के बाद यही लोग प्रवचन दे रहे हैं कि आज के बल्लेबाजों को खेलना नहीं आता। अगर ये बल्लेबाज तकनीकी तौर पर दक्ष थे तो अपनी नाकामी का प्रतिशत क्यों नहीं 25% के नीचे रख पाए? मेरा आकलन यही है कि हर बल्लेबाज आसान पिच पर ही रन बनाता है। जहां भी गेंद में कोई हलचल होती है बल्लेबाज का टिक पाना काफी हद तक लक पर निर्भर करता है। गावस्कर को लीजिये, वो बंगलुरू की 96 रन जैसी कितनी पारी खेल पाए अपने पूरे करियर में?

इसी कसौटी पर मौजूदा बल्लेबाजों को देखिए।
विराट कोहली 153 टेस्ट इनिंग्स में 71 बार 25 इससे कम के स्कोर पर आउट हुए। नाकामी फीसदी 46.7.
रोहित शर्मा 63 पारियों में 29 बार 25 इससे कम के स्कोर पर आउट हुए। नाकामी 46% गावस्कर के बराबर
इंग्लैंड के कप्तान जो रुट 187 पारियों में 82 बार 25 इससे कम के स्कोर पर आउट हुए।यानी 43.7% पर नाकाम रहे रुट। जेफ बायकॉट के बराबर है ये आंकड़ा।
यानी निष्कर्श ये कि तकनीकी दक्षता एक मिथक है।

08/02/2021

75 टेस्ट में
अश्विन 386
मुरली 420
स्टेन 383
हेडली 378
मैक्ग्रा 358
मार्शल 352
हेराथ 351
कुंबले 346

Photos from खेल की बात's post 25/06/2020

25, जून 1983. भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी उपलब्धि का दिन। 37 साल पहले आज का दिन भारतीय क्रिकेट के इतिहास की विभाजक रेखा है। इस कामयाबी ने भारतीय क्रिकेटरों में जीत का जज्बा पैदा किया। आज वर्ल्ड क्रिकेट में हमारी जो भी साख है, उसकी नींव 1983 वर्ल्ड कप में ही पड़ी। बधाई टीम कपिल देव। हिन्दुस्तान के क्रिकेट प्रेमियों को एक खूबसूरत याद देने के लिए।


08/03/2020

मेलबर्न में चिंता में डूबा भारतीय खेमा।

08/03/2020

2003 वर्ल्ड कप फाइनल के पैटर्न की एक और झलक। तब विशाल लक्ष्य का पीछा करते हुए पहले ओवर में सचिन आउट हुए थे। यहां महिला टीम की सचिन समझी जाने वालीं शेफाली वर्मा आउट।

08/03/2020

शाबाश दीप्ति। 5 गेंद में ऑस्ट्रेलिया के 2 विकेट। क्या टीम इंडिया की वापसी की शुरुआत है?

08/03/2020

मूनी की विस्फोटक पारी का लुत्फ लेती मूनी की बहन बेथ

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