06/10/2024
Nirog Swasthya Niketan
We treat people by using Natural Therapeutics, Acupressure, Yoga & Ayurveda. This page is managed by Dr. Anuradha Mani Shukla & Dr. Sanjay Kumar Singh.
06/10/2024
02/03/2022
17/11/2021
अरोग्य योग भारतीय ,अखिल भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा परिषद ,एवं निरोग प्राकृतिक चिकित्सालय ,गोरखपुर के तात्वाधान मे प्राकृतिक चिकित्सा दिवस के ऊपलक्षय मे सुरज कुंड धामं मे डा अनुराधा माणि शुक्ला एवं डा संजय सिह के द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा के फायदे बता कर लोगो को जागरुक किया गया ,अभय नाथ उपाध्याय ने लोगो को योग के बारे मे बताया ,साथ ही मैं आभार ब्यक्त krna चाहुंगी ,महंत इन्द्रेश नाथ जी का ज़िनके सहयोग से कार्यकरम सफल हुआ 🙏🙏
27/10/2021
26/10/2021 से शुरू होकर 27/10/2021 को खत्म होने वाला दो दिवसिय लाधु उद्योग मेला मे डा सत्य़ा pandey दीदी पूर्व मेयर द्वारा सम्मान पाने का सौभाग्य प्रपत हुआ 🙏
26/01/2021
26जनवरी के शुभ अवसर पर वेद सुत्र की ओर से गठिया से परेशान बहनो एवं भाईयो के लिए अमुल्य उपहार ज्वाइन्ट सुत्र ज़िन लोगो को चलने ,बैठने ,उठने मे घूटने ,कमर,और हाथो के जोड़ो मे दर्द ,सुजन ,अकडन रहने पर दो से तीन दिनो मे आराम
20/09/2020
Vedsutra Chwanprash 👍
प्राकृतिक चिकित्सा भाग (४) अग्नि तत्व चिकित्सा
अग्नि तत्त्व वायु, जल, पृथ्वी, तीनों से अधिक सूक्ष्म , विरल , और सशक्त है । पृथ्वी पर सम्पूर्ण ऊर्जा सूर्य से अग्नि तत्व के रूप में आती है । अग्नि तत्व की ऊर्जा से ही वायु , जल , पृथ्वी , तथा पृथ्वी पर के समस्त जीवों को जीवन तथा गति मिलती है । पेड़ पौधे बनस्पतियो में अग्नि तत्व की ऊर्जा ही संग्रहीत हैं जो प्राणियों के भोजन के काम आता है और हमें कार्य करने के लिए ऊर्जा मिलती हैं । यदि किसी के अंदर से अग्नि तत्व की सम्पूर्ण उर्जा निकल जाय तो उसका शरीर ठंडा हो जाता है और लोग कहते हैं कि बह मर गया । यदि अग्नि तत्त्व की ऊर्जा थोड़ी कम हो जाती है तो आप बीमार हो जाते हैं । यदि शरीर में अग्नी तत्व की मात्रा थोड़ी सी अधिक तो भी आप बीमार हो जाते हैं । शरीर में तथा इस पृथ्वी पर अग्नि तत्त्व की ऊर्जा सदैव संतुलित और नियंत्रित होना चाहिए । वायु तत्व की ऊर्जा अग्नि को बढ़ा देती है । जल तत्त्व की ऊर्जा शीतलता प्रदान कर अग्नि तत्त्व कम करती है । पृथ्वी तत्त्व को ऊर्जा आग्नि को अवशोषित कर के नियंत्रित करती है । अनियंत्रित तथा असंतुलित अग्नि तत्व की ऊर्जा शरीर के लिए तथा पृथ्वी पर भयंकर विनाश कारी होती है ।
अग्नि तत्व प्रकाश , तेज , ओज , ज्ञान , वुद्धि , विवेक , हमारा आभा मंडल , पाचन शक्ति जठराग्नि , काम शक्ति कामाग्नि , प्रजनन , वृद्धि , उत्पत्ति, पालन , विनाश सबका कारक है ।
चायनिज एक्यूप्रेशर/एक्यूपंक्चर तथा ट्रेडिशनल चायनिज मेंडिसिन में हार्ट ( हृदय ) तथा आमाशय ( स्टमक ) और पेरिकार्डियम ( हृदयावरण/ मस्तिष्क ) , ट्राईवार्मर (त्रिऊष्मक / तंत्रिका तंत्र ) ये चार अंग तथा इनके नाम पर इनके चार मिरिडियन हैं । जिनमें अग्नि तत्त्व को ऊर्जा का प्रवाह होता है । अग्नि तत्व के संतुलन में हम इनका प्रयोग करते हैं
अग्नि तत्व शरीर में जहां कम होता है वहां शरीर में तेज दर्द होने लगता है तो अग्नि से वहां पर सेकाई करने से तुरंत राहत मिलती है ।
ठंडक के मौसम में जब ठंड से शरीर कांपने लगता है तो आग से सिकाई करने से लाभ होता है ।
ठंड के कारण जब शरीर में जकड़न हो जाती है तो आग या धूप से शरीर की सिकाई करने से आराम मिलता है ।
सूर्य की किरणों में समस्त रोगों को दूर करने और हानिकारक वैक्टिरीया और वायरस को नष्ट करने की शक्ति है ।
*एड़ी दर्द को दूर करने के उपाय*
1. एड़ी के दर्द से छुटकारा पाने के लिए पैरों को आराम दें और उनपर ज्यादा वजन न डालें।
2. इस दर्द से राहत पाने के लिए बर्फ की सिंकाई भी बहुत फायदेमंद है। इसलिए हर तीन-चार घंटे में 20 से 30 मिनट तक एड़ी की बर्फ से सिंकाई करें। नियमित रूप से ऐसा करने पर आपको एड़ी के दर्द से राहत मिल जाएगी।
3. अगर आपकी एड़ी में अक्सर दर्द रहता है तो अच्छी क्वालिटी के जूते पहनें, जो आपके पैरों के हिसाब से कम्फर्टेबल हों।
4. एक्सरसाइज करने से पहले स्ट्रेचिंग व्यायाम जरूर करें। इससे न सिर्फ आपकी एड़ी का दर्द दूर होता है बल्कि इससे पैरों का संतुलन भी बना रहता है।
5. सबसे पहले एक तौलिए को मोड़कर अपने तलवों के नीचे रखें। अब एड़ियों को ऊपर की तरफ उठाएंकर पैरों को स्ट्रेच करें। इस पोजीशन में करीब 15-30 सेकेंड के लिए रहें और इसके बाद सामान्य स्थिति में आ जाएं। इस एक्सरसाइज से आपका एड़ी का दर्द गायब हो जाएगा।
6. अगर आपकी एड़ी में मोच आने के कारण दर्द रहता है तो स्ट्रेंथनिंग और बैलेंस एक्सरसाइज करें। इससे आपको दर्द से आराम मिलेगा।
*👉🏻एड़ी के दर्द को दूर करने के घरेलू उपाय*
1. एड़ी के दर्द से राहत पाने के लिए दिन में कम से कम 3 बार नारियल या सरसों के तेल से मालिश करें। इससे आपको दर्द से जल्दी राहत मिलेगी।
2. एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर हल्दी भी एड़ी के दर्द को दूर करने में मदद करती है। इसके लिए आप 1 गिलास दूध में आधा चम्मच हल्दी और शहद मिलाकर रात को सोने से पहले पीएं। आपको सुबह तक आराम मिल जाएगा।
3. इस दर्द को दूर करने के लिए गुनगुने पानी में 2 चम्मच सेंधा नमक मिलाकर उसमें 15-20 मिनट तक पैर भिगोएं। इससे आपको दर्द से तुरंत आराम मिल जाएगा।
4. रोजाना सुबह एलोवेरा जेल का खाली पेट सेवन भी एड़ी के दर्द को दूर करने में मदद करता है। इस नुस्खे से आपको कुछ ही दिन में फर्क दिखने लग जाएगा।डा अनुराधा माणि शुक्ला निरोग प्राकृतिक चिकित्सल्य गोरखपुर
01/08/2020
गुर्दे की पथरी एवं प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा उपचार पि त्ताशय तथा गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी (Stone of Gall Bladder,kidney and urinary tract)
परिचय:-पथरी का रोग पुरुषों से अधिक स्त्रियों में पाया जाता है। पित्ताशय में जब दूषित द्रव्य जमा होकर ठोस रूप ले लेता है तो इस ठोस पदार्थ को पथरी कहते हैं। पित्ताशय में जब पथरी होती है तो उसे पित्ताशय पथरी कहते हैं।
पथरी दूषित द्रव्य का जमा हुआ वह ठोस समूह होता है जो शरीर के विभिन्न स्थानों पर हो सकती है। यह छोटी, बड़ी अनेक तथा विभिन्न आकृतियों की हो सकती है।
पित्ताशय में पथरी रोग होने के लक्षण-
जब किसी व्यक्ति को पित्ताशय में पथरी का रोग हो जाता है तो इसके कारण रोगी व्यक्ति को अरुचि तथा अपच की समस्या हो जाती है।
जब रोगी व्यक्ति भोजन कर लेता है तो उसका पेट भारी होने लगता है।
रोगी के पित्ताशय के भाग में तेज दर्द होता है तथा उसके शरीर में कम्पन होने लगता है और रोगी को हल्का बुखार भी हो जाता है।
रोगी का जी मिचलाने लगता है तथा उसे उल्टियां भी होने लगती हैं।
पित्ताशय में पथरी रोग होने का कारण-
यह रोग व्यक्ति को भूख से अधिक भोजन करने के कारण होता है। भोजन में चिकनाई वाली चीजों का अधिक प्रयोग करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
अधिक औषधियों का सेवन करने के कारण भी पथरी का रोग हो सकता है।
मिर्च-मसाले वाली चीजों का अधिक सेवन करने के कारण भी पित्ताशय में पथरी का रोग हो सकता है।
अधिक सोने, अधिक मात्रा में शराब का सेवन करने, कोई मेहनत का कार्य न करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
कब्ज बनने के कारण भी यह रोग व्यक्ति को हो जाता है।
मांस, अण्डे का अधिक सेवन करने के कारण भी पित्ताशय में पथरी का रोग हो सकता है।
स्त्रियों में यह रोग मासिकधर्म के किसी रोग के हो जाने के कारण से हो सकता है।
गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग होने के लक्षण-
जब यह रोग हो जाता है तो रोगी के पेट के आगे के भाग में अचानक बहुत तेज दर्द होने लगता है। कभी-कभी रोगी का जी मिचलाने लगता है और उसे उल्टियां भी होने लगती हैं।
जब रोगी व्यक्ति पेशाब करता है तो उसे पेशाब करने में परेशानी होती है और पथरी के कारण रोगी को कभी-कभी बुखार भी आ जाता है।
रोगी व्यक्ति को कंपकपी होती है तथा पसीना भी आने लगता है
इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी कभी पेशाब में रक्त (खून) भी आ जाता है।
जब रोगी व्यक्ति पेशाब करता है तो पेशाब की धार फट जाती है जिससे पेशाब की धार इधर-उधर गिरने लगती है।
कई बार तो पथरी मूत्रयंत्र में बहुत लम्बे समय तक बनी रहती है लेकिन इसके लक्षण सामने दिखाई नहीं देते हैं।
गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग होने का कारण-
जब कोई मनुष्य अपने मूत्र के वेग को बार-बार रोकता है तो उसे यह रोग हो जाता है
जब कोई व्यक्ति जरूरत से बहुत कम पानी पीता है तो भी उसे यह रोग हो सकता है।
भोजन में अधिक नमक, मिर्च-मसाले, अचार, चीनी तथा मैदे से बनी चीजों का अधिक इस्तेमाल करने के कारण गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी का रोग हो सकता है।
औषधियों का अधिक सेवन करने के कारण भी गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग हो सकता है।
तम्बाकू, गुटका तथा शराब का अधिक इस्तेमाल करने के कारण भी गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग हो सकता है।
शरीर में विटामिन `ए´, `बी´ तथा `सी´ की कमी हो जाने के कारण भी गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग हो सकता है।
शारीरिक कार्य अधिक करने तथा मानसिक कार्य करने के कारण भी गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग हो सकता है।
पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-
जब किसी व्यक्ति को यह रोग हो जाता है तो उसे ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को हल्के गर्म पानी में नींबू का रस मिलाकर पिलाना चाहिए तथा उपवास रखवाना चाहिए। इसके बाद 3 से 7 दिनों तक सफेद पेठे का रस और केले के डण्डे के रस को नारियल पानी में मिलाकर प्रतिदिन पीने से रोगी के पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाले पथरी रोग जल्दी ही ठीक हो जाते हैं। पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी को ठीक करने के लिए रोगी को कुछ दिनों तक उपवास रखना चाहिए। उपवास के दौरान उसे तरबूज, गाजर, संतरा, लौकी आदि का रस अधिक मात्रा में पीना चाहिए। इसके बाद रोगी को 6 सप्ताह तक फलों का रस पीना चाहिए और अधिक मात्रा में अंगूर, सेब, नाशपाती, अनन्नास तथा आंवला का अधिक मात्रा में सेवन करना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।
पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी को ठीक करने में पका जामुन, बथुआ, मेथी, चौलाई, धनिया, पुदीना के पत्तों का साग बहुत लाभकारी रहता है।
पालक के रस में शहद मिलाकर प्रतिदिन पीने से कुछ ही दिनों में पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी ठीक हो जाती है।
गाजर एवं चुकन्दर का रस प्रतिदिन दिन में 3-4 बार पीने से पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाले पथरी ठीक हो जाती है।
पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाले पथरी को ठीक करने के लिए सब्जियों का रस पीना लाभदायक रहता है
पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी से पीड़ित रोगी को प्रोटीन युक्त खाद्य-पदार्थ, मलाई, दूध, पनीर, घी आदि वसायुक्त पदार्थों का तथा मांसाहार पदार्थों का सेवन भी नहीं करना चाहिए।
लगभग 7-8 ग्राम पपीते की जड़ को अच्छी तरह धोकर पानी के साथ पीसकर और कपड़े से छानकर सुबह के समय में खाली पेट 3 सप्ताह तक पीना चाहिए। जिसके परिणाम स्वरूप पित्ताशय की पथरी गलकर निकल जाती है और रोगी का यह रोग ठीक हो जाता है।
कुलथी की दाल को सुबह के समय में पानी में भिगोकर रख दें तथा शाम के समय में इसे पानी में पीसकर उस पानी को पी लें। इस प्रकार से प्रतिदिन प्रयोग करने से कुछ ही दिनों में हर प्रकार की पथरी गलकर शरीर से बाहर हो जाती है।
तुलसी के पत्तों के साथ अंजीर को प्रतिदिन खाने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
तुलसी के रस को शहद के साथ मिलाकर प्रतिदिन 6 महीने तक सेवन करने से पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी ठीक हो जाती है।
पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को पेट पर मिट्टी की पट्टी करनी चाहिए। फिर इसके बाद एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए। फिर पेट की गर्म ठण्डी सिंकाई करनी चाहिए और रोगी को कटिस्नान, भापस्नान, गर्म पादस्नान, मेहन स्नान करना चाहिए। फिर इसके बाद रोगी को अपने शरीर पर कुछ मिनटों के लिए गीली चादर लपेटनी चाहिए और अपने शरीर को सूखे कपड़े से पोछना चाहिए। रोगी को अपने रीढ़ की हड्डी तथा गर्दन के पास मालिश करनी चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन यह प्रयोग करने से रोगी के पथरी सम्बन्धित सभी रोग जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी को ठीक करने के लिए रोगी को सूर्यतप्त सफेद बोतल का जल प्रतिदिन पीना चाहिए ताकि शरीर में विटामिन `डी´ सही मात्रा में मिल सके जो की कैल्शियम को हजम करता है पथरी को दूर करता है।
पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन हैं जिन्हें करने से ये ठीक हो जाती हैं ये आसन इस प्रकार हैं- हलासन, धनुरासन, योगमुद्रासन, भुजंगासन, शलभासन, पश्चिमोत्तानासन, सर्वांगासन तथा प्राणायाम आदि।
पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी से पीड़ित रोगी के पेट या मूत्रसंस्थान तथा गुर्दे में दर्द होने लगे तो उसे दूर करने के लिए गर्म पानी के टब में बैठ जाएं तथा जब पानी ठंडा हो जाए तो उसमें फिर से थोड़ा गर्म पानी डालकर बैठ जाए। यदि गर्म पानी के टब में बैठना मुश्किल हो तो गर्म पानी से भीगा हुआ तौलिया अपने पेट पर रखें तथा तौलिये को गर्म पानी में भिगोकर बदलते रहना चाहिए।
जानकारी-
इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी जल्दी ही ठीक हो जाती है। डा अनुराधा माणि शुक्ला , निरोग प्राकृतिक चिकित्सल्य गोरखपुर एवं अरोग्य चिकित्सा केन्द्र ,गोरखपुर
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