National Gym-jodhpur

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03/05/2023
01/05/2023

Khivraj gurjar

10/08/2022

रावलो के 27 गांवों के बीच मे बसी हुई है, जो महान गुर्जर सम्राट राजा बप्पा रावल की नगरी है, जिसका नाम उस प्रतापी सम्राट के नाम पर है, उस नगरी बापौली से, दो प्रो कब्बड्डी स्टार खिलाड़ी नीतिन रावल और राहुल रावल, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से समस्त गुर्जर समाज को गोरवान्वित किया है ॥

01/08/2022

जाटों की बेटियां वर्ल्ड चैंपियन बन रही है।
5 गोल्ड मैडल अपने आप में एक इतिहास है। आप वर्षो बाद एक मैडल जीतने को इतिहास कहते हो।
असल इतिहास इसे कहते है जो इन बेटियो ने रचा है। दुनिया की नजरे भारतीय कुश्ती की ताकत को उभरता देख रही है।
ये बेटियां उस हरयाणा की बेटियां है जिसे बदनाम करने में भांड लोगो ने कोई कसर नहीं छोड़ी।

गांव पंचायत खेत पशुपालन को बदनाम करने वाले देख ले। गांवो के आदर्श बालक ऐसे होते है जिनसे टकराने का जिगरा विश्व में किसी के पास नही है।

रितिका (43kg), प्रिया मलिक (73kg), मुस्कान (40kg), सविता (61kg), हर्षिता (69kg)
वास्तविक जट्ट

29/07/2022

Dharmendra, Dara Singh, Shammi Kapoor, Pran and Dilip Kumar 🙏

11/06/2022

जोधपुर महाराजा गजसिंह सिंह जी इंग्लैंड से अपनी शिक्षा पूर्ण करने पर जोधपुर आगमन के समय जोधपुर की जनता द्वारा अपने युवराज का भव्य फूलो, मालाओ ढोल नगाड़ों के साथ भव्य स्वागत किया गया, जिसका मनमोहक दृश्य, 36 कोम के सम्मिलित होने के पर्व पर वो भी बिना किसी लालच बिना किसी संदेश बिना किसी पार्टी पद, इन सबसे कोशो दूर अपने महाराज में अपने भविष्य को देखते हुए एकत्रित हुए थे,
परंतु आज भी कई राजनेता कुछ मंदबुधिवादी कुछ नकली समाज में ये जहर फैलाते है कि सामंतवाद क्षत्रिय जिन्होंने दलित का शोषण किया,वास्तविक शोषण तो वर्तमान राजनीती कर रही है, राजपूत शासन काम में 36 कोम के लिए क्षत्रिय ने अपने प्राण दिए अपने परिवार की चिंता छोड़ दूसरो के परिवार की रक्षा की तभी ये भीड़ एकत्रित हुई है, अन्यथा वर्तमान राजनीति में पैसे देकर लालच देकर भीड़ एकत्रित की जाती है, पंरतु फिर कांग्रेस के इतने लंबे भारतीय शासन काल में मुगलों को महान बताकर क्षत्रिय को नीचा दिखाने उनके इतिहास के साथ तोड़ मरोड़ करने के कारण भी कुछ लोगो की भावनाए भ्रमित हई है,परंतु वर्तमान शासन काल एवम क्षत्रिय काल शासन की तुलना किसी बड़े बुर्ज के साथ बैठ कर रहे क्यों की यूवाओ को तो जो कांग्रेस एवम अन्य शासकीय राजनेताओं ने जो पढ़ाया वही याद रहेगा, इस लिया संस्कृति एवम सभ्यता एवम शासन की वास्तविक स्थिति को जानना हो तो किसी गांव के बुजर्ग के पास बैठ कर जाने, वर्तमान शासन काल और उस समय के शासन में बहुत फर्क था आज जनता दबाव में है उस समय राजा दवाब में होता था क्यों की उसे प्रजा चुनती थी आज पैसा चुनता हैं जो कभी प्रजापलक नही हो सकते सिर्फ परिवार और कुटुंब पालक नेता है जो संस्कृति एवम सभ्यता को सिर्फ अपने राजनितिक स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए याद करते है
वो समय था और आज एक कलयुग समय है
जिसमे हर कोई समाज व्यक्ति विशेष वर्ग राजपूत की नकल करता है राजपूत बनना चाहता है, परंतु राजपूत से नफरत करता है ये वर्तमान राजनीति के परिणाम है, जिसे राजपूत ही नही आम जनता भुगतेगी,

04/06/2022

मूर्तिकार प्रदीप चहल जी द्वारा महाराजा सूरजमल जी का 10 इंची का स्टेचू बनाया गया महाराजा सूरजमल यूथ ब्रिगेड की तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं

26/05/2022

सहारनपुर के यतीन्द्र सिंह गुर्जर बॉडीबिल्डर को एशिया ओर विश्व चैंपियनशिप में चयनित होने पर बहुत बहुत बधाई💪👈❤️❤️

04/03/2022

भरतपुर में अंग्रेजों के खून से लाल कर दी थी धरा....

13 बार अंग्रेजी शासन की पगड़ी को पैरों के नीचे कुचला
-------जब जाटों ने किया अंग्रेजों का सूर्यास्त------

भरतपुर का युद्ध(1805) जाट vs अंग्रेज
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कलकत्ता से इंग्लैंड तक टपके अंग्रेजों के आंसू

बात 1805 की है जब भरतपुर के महाराजा रणजीत सिंह जी को यह ज्ञात हुआ कि अंग्रेज भारत में गौ मांस खाते हैं तो उन्होंने तुरंत अंग्रेजों से संधि तोड़ दी और उन्होंने अंग्रेजों से सारे सम्बन्ध तोड़ने के साथ अपने राज्य में बिना आज्ञा घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया।

उसी समय मराठा सेनापति यशवंत राव होल्कर अंग्रेजो से युद्ध कर रहा था। अंग्रेजी सेना ने उन्हें घेरने का प्रयास किया तो वे भागकर भरतपुर राज्य की सीमा में घुस गए... और उन्होंने अपने मित्र भरतपुर महाराज से शरण मांगी। महाराज श्री ब्रिजेन्द्र सवाई रणजीत सिंह जी को पता चला तो वे तुरंत अपने मित्र होल्कर को अपने दरबार में ले आये। जब अंग्रेजों को पता चला तो उन्हें काफी आश्चर्यजनक लगा। उन्होंने भरतपुर दरबार को चिट्ठी भेजी कि या तो होल्कर को छोड़ दें और या फिर युद्ध के लिए तैयार रहे।
अंग्रेजों की इस धमकी का महाराज पर कोई असर न हुआ। उन्होंने कहा कि होल्कर मेरी शरण में आया है और शरणागत के लिए हम भारतीय अपने प्राणों तक कि बाजी लगा सकते हैं। और होल्कर मेरा मित्र भी है तुम नीच गौभक्षकों से मैं युद्ध करने के लिए आतुर हूँ।

यह सुनकर अंग्रेजी सेना ने क्रोधित होकर 2 जनवरी 1805 को भरतपुर पर आक्रमण कर दिया... यह युद्ध अप्रैल 1805 तक जारी रहा। तीन महीने चले इस युद्ध को महाभारत का आधुनिक संस्करण कहा जाता है। इस दौरान अंग्रेजों ने लोहागढ़ पर कुल 13 आक्रमण किये और 13 क 13 बार उन्हें मुंह की खानी पड़ी।
महाराज रणजीत सिंह और यशवंत राय होल्कर के निर्देशन में भरतपुर के मात्र 10,000 जाट यौद्धाओं ने 20 हजार अंग्रेजों को बुरी तरफ से मारा। लगभग साढ़े तीन हजार अंग्रेज इस युद्ध में मारे गए।

अंग्रेज स्वयं लिखते हैं कि जाट सैनिक इतने जोशीले भाव में लड़ रहे थे कि हम 60 यार्ड से उन्हें गोली मार रहे थे पर वे बचने के लिए एक बार भी सिर नीचे नहीं झुका रहे थे। ऐसा लग रहा था कि मानो गोली उन तक पहुंच ही न रही हो।

अंग्रेजों ने यह भी लिखा कि उन्हें युद्ध के समय भरतपुर में देवी शक्ति के दर्शन हुए। भरतपुर की कुलदेवी हाथ में भगवा ध्वज लिए किले की रक्षा कर रही थी।

एक अंग्रेज लेफ्टिनेंट टेम्पलटन जैसे तैसे ब्रितानी झंडा लेकर किले की दीवार पर गाड़ने जा पहुंचा। भरतपुर के सैनिकों ने उसे घेर लिया। जाटों ने उसे मारा नहीं बल्कि उसकी जूतों से पिटाई की। झंडे को जूतों तले रौन्दा और सैनिक को झंडे समेत नीचे खाई में फेंक दिया जहां दलदल में धसकर वह मर गया।

अंग्रेजों ने 4 बड़े हमलों के बारे में विस्तार से लिखा है...

उन्होंने बताया कि 9 जनवरी की रात को कर्नल रेयान, मेजर हॉक्स और लेफ्टिनेंट कर्नल मेटलैंड ने भरतपुर पर तीन ओर से एक साथ हमला किया। भारी गोलाबारी से किले की एक दीवार में छेद ह्यो गया लेकिन जैसे ही अंदर घुसने की कोशिश की तो आगे जाट सैनिक यमराज बनकर उन पर टूट पड़े। इस युद्ध में 400 अंग्रेज मारे गए और मेटलैंड घायल होकर गिर पड़ा। हमने जैसे तैसे अपनी जान बचाई। कई सैकड़ों सैनिक घायल अवस्था में कहरा रहे थे।

हमने 16 जनवरी को एक आक्रमण किया जिसमें 500 अंग्रेज मारे गए जिसमे एक सेनापति लेफ्टिनेंट कर्नल मैकरॉय को भी भरतपुर के सैनिकों ने मौत के घाट उतार दिया। अंग्रेजी सेना के हजार के लगभग सैनिक घायल हो गए थे।

21 जनवरी के आक्रमण के दौरान अंग्रेजों ने भारी गोलाबारी की दीवार के कुछ हिस्से टूट गए। लेकिन किसी भी अंग्रेज सैनिक की आगे बढ़ने की हिम्मत न हुई। क्योंकि वे जानते थे कि वे दीवार पार तो कर देंगे लेकिन आगे खड़े जाटों के पास पहुंचने पर वापिस जीवित न आ पाएंगे।

अंग्रेज लिखते हैं कि सबसे भयानक तो ये था कि किले की दीवारों पर जाटों से लड़कर घायल होने वाले अंग्रेजी सैनिक नीचे खाई में जा गिरते व निकल नहीं पा रहे थे। और बाद में समय मिलने पर जाट सैनिक नीचे आते और उन्हें मौत के घाट उतार देते थे।

6 फरवरी के आक्रमण के दौरान अंग्रेजों ने सुरंग बनाई लेकिन जाटों को पता चल गया और सुरंग के मुहाने पर खड़े जाटों ने एक एक को काट दिया।

21 फरवरी के आक्रमण के दौरान अंग्रेजों ने जान की बाजी लगा दी उन्होंने एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर दीवार पर चढ़ने की कोशिश की। जाटों ने अंग्रेजों पर गोलियां व्यर्थ न करके पत्थर बरसाने शुरू कर दिए सब सैनिक घायल होकर भाग खड़े हुए। एक तरफ गोलाबारी से कुछ छेद हुए लेकिन वहां पहुंचने वाले अंग्रेजों को भी जाटों ने मौत के घाट उतार दिया।

इस तरह कुल 13 आक्रमणों में साढ़े 3 हजार ब्रिटिश सैनिक मारे गए जिनमें बड़ी संख्या में बड़े अधिकारी शामिल थे और लगभग 8 हजार ब्रितानी सैनिक घायल हुए। ऐसा कोई सैनिक न बचा था जिसे कहीं चोट न लगी हो।

कहते हैं कि जाटों ने अंग्रेजों को कलकत्ता तक रुलाया था। जाट भरतपुर में अंग्रेजों को मार रहे थे और उनके परिवार व ईस्ट इंडिया कम्पनी की चीखें तत्कालीन राजधानी कलकत्ता से निकल रही थी।

अंग्रेज सेनापतियों ने दूर डेरे डाले और फिर प्रशासन को समझाया कि यहां हमारा सूर्यास्त ह्यो चुका है अगर अब और लड़े तो बहुत दुष्परिणाम होंगे।
लार्ड लेक ने स्वयं इंग्लैंड में वेलजली को पत्र लिखते हुए कहा कि हमें लगता था कि हम भरतपुर को आसानी से जीत लेंगे लेकिन यह हमारी भूल थी। हम नर रहे हैं अब और आगे लड़े तो हमें इतना नुकसान होगा कि हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।

उस समय भरतपुर कोई बड़ा राज्य न रह गया था। दिल्ली के बादशाह व रुहेले एवं पठानों से लड़ने के कारण महाराज रणजीत सिंह का कोष पहले से ही खाली था।

अंग्रेजों ने संधि का प्रस्ताव भेजा, भरतपुर के कुलपुरोहित एवं मंत्रियों ने संधि को स्वीकृत करने के लिए महाराज पर दबाव डाला क्योंकि राज्य के आर्थिक हालात कमजोर थे।
उधर अंग्रेज भी पड़ोसी राज्यों के माध्यम से महाराज पर दबाव बना रहे थे।

हालांकि युद्ध और चलता तो भरतपुर की सेना का गोला बारूद खत्म होने की कगार पर था जिसके दुष्परिणाम हो सकते थे।

इसलिए अंत में संधि की गई कि अंग्रेज भरतपुर पर कभी आक्रमण न करेंगे। और गौहत्या करने की हिम्मत न करेंगे।

महाराज रणजीत सिंह ने इस युद्ध की याद में फतेह बुर्ज का निर्माण किया था।

इन युद्ध की इतनी ख्याति फैल गयी थी कि ब्रिज कवि से लेकर पूरे राजस्थान के कवि भरतपुर का उदाहरण देकर अपने क्षेत्र व राज्यों के प्रितिनिधियो को जगाने का प्रयास करने लगे थे....

जोधपुर के राज कवि बांकीदास जी ने लिखा कि

पूरा जोधड़, उदैपुर, जैपुर, पहूँ थारा खूटा परियाणा।

कायरता से गई आवसी नहीं बाकें आसल किया बखाणा ॥

बजियाँ भलो भरतपुर वालो, गाजै गरज धरज नभ भौम।

पैलां सिर साहब रो पडि़यो, भड उभै नह दीन्हीं भौम ॥

अर्थ है कि “हे जोधपुर, उदयपुर और जयपुर के मालिको ! तुम्हारा तो वंश ही खत्म हो गया। कायरता से गई भूमि कभी वापिस नहीं आएगी, बांकीदास ने यह सच्चाई वर्णन की है। भरतपुर वाला जाट तो खूब लड़ा। तोपें गरजीं, जिनकी धूम आकाश और पृथ्वी पर छाई थी। अंग्रेजों के सिर काट डाले, लेकिन खड़े-खड़े अपनी भूमि नहीं दी।”

महाराजा रणजीत सिंह ने गौरक्षा, शरणागत की रक्षा, मित्रता एवं देश और राज्य के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया था और अंग्रेजों को दिखा दिया था कि हम किसी से कम नहीं हैं। महाराज रणजीत सिंह जी ने अंग्रेजों से पहले दिल्ली की मुगल सत्ता, पठान व रुहेलों के खिलाफ भी युद्ध लड़े और धर्म रक्षा करते हुए भगवा ध्वज की शान बढ़ाने का निरंतर प्रयास किया।

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