પ્રસ્વેદ અભિષેકમાં લાવીશ, મહાદેવ!
લાગે છે મને તો જ તું તારીશ, મહાદેવ!
એકાદ અહીં વૃક્ષ ઉગાડીશ, મહાદેવ!
હું બાદ તને બિલ્વ ચડાવીશ, મહાદેવ!
મંત્રો પછી મોંઢે કરી આવીશ, મહાદેવ!
પહેલાં હું અભણ એક ભણાવીશ, મહાદેવ!
એવુંય બને, ત્યારે મને ત્રીજી મળે આંખ;
પ્રત્યેકમાં જ્યારે હું નિહાળીશ, મહાદેવ!
મારાય ગળામાં, પછી વીંટાય ફણીધર;
હું ઝેર પ્રથમ મારું ઉતારીશ, મહાદેવ!
મેં ભાવ ઉમેરી અહીં પાણીને કર્યું જળ;
ગંગાનું ગણી જળ તું સ્વીકારીશ, મહાદેવ?
તેથી જ ઉતારું તને દરરોજ ગઝલમાં;
ક્યારેક તો તું શ્લોક લખાવીશ, મહાદેવ!!!
~ ગૌરાંગ ઠાકર
Ashtang Yog
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02/11/2020
प्रलंब मुद्रा लगाने की विधि एवं लाभ
अपने दोनो हाथो को आशीर्वाद की स्थिति में लाने व व दोनो हाथो के अंगूठे को आपस में मिलाने पर चित्रानुसार जो आकृति बनती है उसे योग की भाषा में प्रलंब मुद्रा कहते है
लाभ
1- यह मुद्रा उर्जा की अनन्त शक्ति को दर्शाती है जिसके अभ्यास से हम उर्जा की सकारात्मक शक्ति से जुड़ते है जिससे हमारा मस्तिष्क चेतन से अवचेतन की ओर अग्रसर होता है।
2- इस मुद्रा के अभ्यास से पित्त से सम्बंधित सभी विकार दूर होते है।
3- इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर की नकारात्मकता दुर होती है।
4- इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर की जठराग्नि जागृत होती है।
5- इस मुद्रा के अभ्यास से बलगम खांसी जैसी समस्याओं से निजात मिल जाती है।
अवधि
इस मुद्रा का अभ्यास सुबह शाम 5 से 10 मिनट तक करे।
Karo Yog Raho Nirog
31/10/2020
धनुष मुद्रा लगाने की विधि एवं लाभ
अपने हाथ की तर्जनी मध्यमा व अनामिका अंगुली को मुट्ठी की तरह बंद करने व कनिष्ठिका व अनामिका को सीधा रखने पर चित्रानुसार जो आकृति बनती है उसे योग की भाषा में धनुष मुद्रा कहते है
लाभ
1- यह मुद्रा धनुष को समर्पित है जिसके अभ्यास से नसों की ब्लाकेज खुलती है वात विकार नष्ट होते है और सम्पूर्ण शरीर में खून का प्रवाह बेहतर ढंग से होता है।
2- इसके अभ्यास से स्नायुओं में खिंचाव आने से आँतों में पाचक रस आने लगता है इससे जठराग्नि तेज होती है, पाचनशक्ति बढती है।
3- इसके अभ्यास से थाइरॉयड की समस्या काफी हद तक ठीक हो जाती है।
4- इसके अभ्यास से शरीर में नमी चेतना व स्फूर्ती का अनुभव होता है।
5- इस मुद्रा के अभ्यास से हृदय मजबूत होता है एवं हृदय रोगों में विशेष लाभ मिलता है।
अवधि
इस मुद्रा का अभ्यास सुबह खाली पेट 2 से 3 मिनट तक करे
Karo yog Raho Nirog
27/10/2020
दीपक मुद्रा लगाने की विधि एवं
अपने दोनों हाथों को अंजुलि की तरह आपस में मिलाने व दाहिने या बाये हाथ की कनिष्ठिका अंगुली को आकाश की तरफ रखने पर चित्रानुसार जो आकृति बनती है उसे योग की भाषा में दीपक मुद्रा कहते है।
लाभ
1- यह मुद्रा दीपक को समर्पित है जिसे लगाने से हमारी पाचन शक्ति मजबूत होती है वह व हमारा शरीर विषाक्त पदार्थों से मुक्त होता है यह मुद्रा हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है जिससे हम ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ जाते है।
2- इस मुद्रा के अभ्यास से Insomnia की समस्या दूर होती है।
3- इस मुद्रा से नसों में रक्त प्रवाह बेहतर बना रहता है, रक्त प्रवाह बेहतर होने से शरीर स्वस्थ्य रहता है।
4- इस मुद्रा को लगाने से पैरो और मांसपेशियों में किसी भी तरह का ऐंठन ठीक हो जाता है।
5- इस मुद्रा को लगाने से त्वचा से सम्बंधित सभी रोग दूर हो जाते है।
अवधि
इस मुद्रा का अभ्यास ब्रह्म मुहूर्त में 5 से 10 मिनट तक करे
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23/10/2020
गोकर्ण मुद्रा लगाने की विधि एवं लाभ
अपनी तर्जनी अंगुली को हल्का सा मोड़कर उसके अंतिम पोर पर अंगुठे को लगाने व बाकी की सभी अंगुलियों को मोड़कर अंजुली जैसे बना लेने पर चित्रानुसार जो आकृति बनती है उसे योग की भाषा में गोकर्ण मुद्रा कहते है।
लाभ
1- यह मुद्रा ऋषियों के द्वारा आचमन के लिए प्रयोग में लाई जाती थी जिससे हृदय की आंतरिक शुद्धि हो जाती थी शरीर से Toxins बाहर निकल जाते थे और मन को शांति मिलती थी।
2- यह मुद्रा जड़ चक्र को उत्तेजित करती है जिसे तनाव और उदासी कम हो जाती है।
3- यह मुद्रा एकाग्रता को बढ़ाकर अनिद्रा, हिस्टीरिया, गुस्सा और निराशा को दूर करती है।
4- हमारे स्नायु तन्त्र पर इस मुद्रा का त्वरित प्रभाव पड़ता है, मन और मस्तिष्क का समन्वय होता है। मन से कुविचार, नकारात्मक, बुरे विचार दूर होते हैं
5- अपने कार्य क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए इस मुद्रा की साधना करने से लाभ होता है
अवधि
Karo Yog Raho Nirog
इस मुद्रा का अभ्यास सुबह शाम 5 मिनट तक करे।
19/10/2020
संतुलित मुद्रा लगाने की विधि एवं लाभ
अपने हाथ की चारो अंगुलियों के प्रथम पोर को आपस में मिलाने एवं अंगुठे को लम्बवत मिला कर रखने पर चित्रानुसार जो आकृति बनती है उसे योग की भाषा में संतुलित मुद्रा कहते है
लाभ
1- इस मुद्रा को लगाने शरीर में पांच तत्व(आकाश पृथ्वी जल वायु अग्नि) एवं त्रिदोष (वात पित्त कफ) संतुलित हो जाते है जिससे हम समस्त रोगों से मुक्त हो जाते है।
2-इसके अभ्यास से मल और दोष विसर्जित होते है तथा निर्मलता प्राप्त होती है।
3- यह मुद्रा पेट के विभिन्न अवयवों की क्षमता विकसित करती है।
4- इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर और नाड़ियों की शुद्धि होती है।
5- एक्युप्रेशर के अनुसार इसके दाब केंद्र बिंदु श्वासनली तथा आमाशय के रोग दूर करते है पेशाब संबंधी दोषों को यह दूर करती है।
अवधि
इस मुद्रा का अभ्यास सुबह शाम 5 से 10 मिनट तक करें।
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15/10/2020
यकृत(Liver) मुद्रा लगाने की विधि एवं लाभ
अपने हाथ की मध्यमा अंगुली को अंगूठे के मूल में लगाने व अंगुठे के प्रथम पोर से अनामिका के प्रथम पोर को मिलाने पर चित्रानुसार जो आकृति बनती है उसे योग की भाषा में यकृत मुद्रा कहते है
लाभ
1- हमारे शरीर में अधिकतर रोग लिवर के ठीक ढंग से कार्य ना करने से उत्पन्न होते है और यकृत मुद्रा का सम्बंध सीधे लिवर से होता है जिसके अभ्यास से हमारे लिवर की कार्यक्षमता तो बढ़ती ही है साथ ही अनेक प्रकार के रोगो का भी नाश होता है, एवं पाचनशक्ति सुदृढ़ होती है।
2-यह मुद्रा मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्र को प्रभावित करती है। इससे पेट के सभी अंग सक्रिय होते हैं।
3-इसका नियमित अभ्यास करने से शरीर की नलियाँ शुद्ध होती है।
4-यह मुद्रा पसीना लाकर शरीर के ताप को दूर करती है।
5-इस मुद्रा के सामान्य प्रयोग से त्वचा कोमल , मुलायम व स्निग्ध रहती है। चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़तीं एवं योवन लम्बे समय तक बना रहता है।
अवधि
इस मुद्रा का अभ्यास सुबह खाली पेट 10 मिनट तक करें।
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11/10/2020
वाराह मुद्रा लगाने की विधि एवं लाभ
अपने दोनो हाथो की चार अंगुलिया को आपस में ग्रिप बना लेने व दोनो हाथों के अंगूठों को त्रिभुजाकार स्थिति में आमने-सामने रखने पर चित्रानुसार जो आकृति बनती है उसे योग की भाषा में वाराह मुद्रा कहते है।
लाभ
यह मुद्रा भगवान विष्णु के वाराहावतार को समर्पित है इस मुद्रा को लगाने से शरीर में वात पित्त कफ का संतुलन स्थापित हो जाता है और हमें रोग मुक्ति में सहायता मिलती है।
इस मुद्रा के अभ्यास से हमारे हाथो और कंधों में मजबुती आती है।
इस मुद्रा के अभ्यास से हमारी संकल्प शक्ति मजबूत होती है।
इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में प्राण शक्ति विकसित होती है
यह मुद्रा के अभ्यास से हमारे शरीर में मौजूद विषाक्त पदार्थ मल मूत्र द्वार से बाहर निकल जाते है।
अवधि
इस मुद्रा का अभ्यास 4 से 5 मिनट तक करने पर विशेष लाभ प्राप्त होता है।
Karo Yog Raho Nirog
08/10/2020
अंकुश मुद्रा लगाने की विधि एवं लाभ
अपने तर्जनी अनामिका व कनिष्ठिका को मुट्ठी की तरह बंद करने एवं अंगुठे को अनामिका पर रखने व मध्यमा को लम्बवत यानि सीधा रखने पर चित्रानुसार जो आकृति बनती है उसे योग की भाषा में अंकुश मुद्रा कहते है।
लाभ
1-अंकुश मुद्रा व्यक्ति को अनुशासित बनाती है। यह मुद्रा रीढ़ में स्थित ऊर्जा-चक्रों को सक्रिय करती है और इसके अभ्यास से व्यक्ति को शीघ्र ही अपनी ऊर्जा बढ़ती महसूस होती है।
2-इस मुद्रा के अभ्यास से माइग्रेन की समस्या दूर होती है।
3-इस मुद्रा के नियमित अभ्यास से हमारे शरीर का ज्ञान तंत्र जागृत होता है।
4-यह मुद्रा समस्त स्नायु मण्डल को शक्तिशाली बनाती है , चेतना व प्राणशक्ति मिलकर बहती रहती है। इसीलिए आज के मानसिक तनाव के युग में बहुत उत्तम मुद्रा है।
5-इस मुद्रा का अभ्यास नित्य प्रतिदिन एक घंटा बैठकर गहरे श्वासों के साथ करने से बुद्धि प्रखर होती है , तेजस्व बढ़ता है , सुख शान्ति का अनुभव होता है और हम पूर्णतय निरोग हो जाते हैं
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