Shri Shri Shiv Shakti Seva Samiti , Noida

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01/10/2023
12/11/2021

भगवान कृष्ण का माता जसोदा को अपने विराट रूप का दर्शन देना।
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*देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥

भावार्थ:-फिर उन्होंने माता जसोदा को अपना अखंड अद्भुत रूप दिखलाया, जिसके एक-एक रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं॥

एक बार बलराम सहित ग्वाल-बाल खेलते-खेलते यशोदा के पास पहुँचे और यशोदाजी से कहा- माँ! कृष्ण ने तो आज मिट्टी खाई है।

यशोदा ने कृष्ण के हाथों को पकड़ लिया और धमकाने लगी कि तुमने मिट्टी क्यों खाई है। यशोदा को यह भय था कि मिट्टी खाने से इसको कोई रोग न लग जाए। कृष्ण तो इतने भयभीत हो गए थे कि वे माँ की ओर आँख भी नहीं उठा पा रहे थे।

तब यशोदा ने कहा- नटखट तूने एकान्त में मिट्टी क्यों खाई। बलराम सहित और भी ग्वाल इस बात को कह रहे हैं। कृष्ण ने कहा- मिट्टी मैंने नहीं खाई है। ये सभी लोग मिथ्या कह रहे हैं।

यदि आप उन्हें सच्चा मान रही हैं तो स्वयं मेरा मुख देख ले। माँ ने कहा यदि ऐसा है तो तू अपना मुख खोल। लीला करने के लिए उस छोटे बालरूप धारी सर्वेश्वर सम्पन्न श्रीकृष्ण ने अपना मुख माँ के समक्ष खोल दिया।

यशोदा ने जब मुख के अंदर झाँका तब उन्हें उसमें चर-अचर संपूर्ण विश्व दिखाई पड़ने लगा।

अंतरिक्ष, दिशाएँ, द्वीप, पर्वत, समुद्र सहित सारी पृथ्वी प्रवह नामक वायु, विद्युत, तारा सहित स्वर्गलोक, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अपने अधिष्ठाताओं एवं शब्द आदि विषयों के साथ दसों इंद्रियाँ सत्व, रज, तम इन तीनों तथा मन, जीव, काल, स्वभाव, कर्म, वासना आदि से लिंग शरीरों का अर्थात चराचर शरीरों का जिससे विचित्र विश्व एक ही काल में दिख पड़ा।

इतना ही नहीं, यशोदा ने उनके मुख में ब्रज के साथ स्वयं अपने आपको भी देखा।

इन बातों से उन्हें तरह-तरह के तर्क-वितर्क होने लगे। यह क्या मैं स्वप्न देख रही हूँ या देवताओं की कोई माया है अथवा मेरी बुद्धि ही व्यामोह है अथवा इस मेरे बच्चे का ही कोई स्वाभाविक अपना प्रभावपूर्ण चमत्कार है।

अन्त में उन्होंने यही दृढ़ निश्चय किया कि अवश्य ही इसी का चमत्कार है और निश्चय ही ईश्वर इसके रूप में आए हैं। तब उन्होंने कृष्ण की स्तुति की जो चित्त, मन, कर्म, वचन तथा तर्क की पहुँच से परे इस सारे ब्रह्मांड का आश्रय है।

जिसके द्वारा बुद्धि वृत्ति में अभिव्यक्त प्रकाश से इसकी प्रतीति होती है। उस अचिन्त्य शक्ति परब्रह्म को मैं नमस्कार करती हूँ।

*अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना॥
हरि जननी बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई॥

भावार्थ:-(माता से) स्तुति भी नहीं की जाती। वह डर गई कि मैंने जगत्पिता परमात्मा को पुत्र करके जाना। श्री कृष्ण ने माता को बहुत प्रकार से समझाया (और कहा-) हे माता! सुनो, यह बात कहीं पर कहना नहीं॥

कृष्ण ने जब देखा कि माता यशोदा ने मेरा तत्व पूर्णतः समझ लिया है तब उन्होंने तुरंत पुत्र स्नेहमयी अपनी शक्ति रूप माया विस्तृत कर दी जिससे यशोदा क्षण में ही सबकुछ भूल गई।

उन्होंने कृष्ण को उठाकर अपनी गोद में बैठा लिया। उनके हृदय में पूर्व की भाँति पुनः अपार वात्सल्य का रस उमड़ गया।
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12/11/2021

‼ कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे
निर्धन के घर भी आ जाना
जो रूखा सुखा दिया मुझे
आ कर के भोग लगा जाना ‼

12/11/2021

राम राज्य क्या है केवल कह भर देने से रामराज्य नही आ जाता ? कैसा था श्रीराम का शासन ? जो आज भी गुड गवर्नेंस का सबसे बड़ा आदर्श है ।

- पीढ़ियां की पीढ़ियां बीत गईं लेकिन राम राज्य के प्रति भारत की जनता का आकर्षण आज भी मौजूद है... आज भी राजनीति में सफलता पाने के लिए हर कोई राम राज्य की माला जपता है लेकिन आखिर ये राम राज्य है क्या ? आखिर राम राज्य कैसा था ?

- गोस्वामी श्री तुलसी दास जी ने श्रीरामचरितमानस के उत्तरकांड में लिखा...

राम राज बैठें त्रैलोका।
हरषित भए गए सब सोका।।
मतलब... श्रीरामचन्द्रजी के राज्य पर प्रतिष्ठित होने पर तीनों लोकों में प्रसन्नता छा गई

- बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप बिषमता सोई।।।।
इसका अर्थ है... सबके सारे शोक जाते रहे और किसी से किसी की कोई दुश्मनी नहीं रही ।

- दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
मतलब... राम-राज्य में दैहिक ताप यानी शारिरिक कष्ट, दैविक ताप यानी दैवीय आपदाएं... जैसे भूकंप... बाढ़ और भौतिक ताप यानी बाहरी कारणों से होने वाले दुख किसी को नहीं रहे

- अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा।
सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
यानी कम उम्र में किसी की मृत्यु नहीं होती और ना किसी को कोई पीड़ा होती है। सभी के शरीर सुंदर और निरोग हैं।

- राम राज कर सुख संपदा ।
बरनि न सकइ फनीस सारदा।।
मतलब... रामराज्य की सुख सम्पत्ति इतनी ज्यादा है कि इसका वर्णन शेषजी और मां सरस्वती जी भी नहीं कर सकती हैं ।

- रामचरित मानस के उत्तरकांड में रामराज्य की व्याख्या करते हुए गोस्वामी तुलसी दास जी ने करीब 20 चौपाइयां लिखी हैं जिनके मुताबिक

- राम राज्य में कोई सपने में भी पाप नहीं करता

- पाप नहीं करता इसलिए किसी तरह की सजा का प्रावधान भी नहीं है

- कभी सूखा नहीं पड़ता है

- समुद्र भी कभी मर्यादा नहीं लांघता

- समुद्र में कोई तूफान नहीं आता

- कभी प्राकृतिक आपदा नहीं आती है

- नदियों का पानी हमेशा साफ और स्वादिष्ट रहता है और पानी उतना ही बरसता है जितना जरूरत है

- ये राम राज्य के बारे में गोस्वामी तुलसी दास की लिखी हुई प्रमुख बातें हैं आप अपने बच्चों को ये लेख जरूर पढ़वाइए ताकी वो भी अपनी संस्कृति और धर्म के बारे में जान सकें।
🌷🙏🏻जय श्री राम 🙏🏻🌷

11/11/2021

नारद मुनि जहां भी जाते थे, बस ‘नारायण, नारायण’ कहते रहते थे। नारद को तीनों लोकों में जाने की छूट थी। वह आराम से कहीं भी आ-जा सकते थे।

एक दिन उन्होंने देखा कि एक किसान परमानंद की अवस्था में अपनी जमीन जोत रहा था।

नारद को यह जानने की उत्सुकता हुई कि उसके आनंद का राज क्या है। जब वह उस किसान से बात करने पहुंचे, तो वह अपनी जमीन को जोतने में इतना डूबा हुआ था, कि उसने नारद पर ध्यान भी नहीं दिया। दोपहर के समय, उसने काम से थोड़ा विराम लिया और खाना खाने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठा। उसने बर्तन को खोला, जिसमें थोड़ा सा भोजन था। उसने सिर्फ ‘नारायण, नारायण, नारायण’ कहा और खाने लगा।

किसान अपना खाना उनके साथ बांटना चाहता था मगर जाति व्यवस्था के कारण नारद उसके साथ नहीं खा सकते थे। नारद ने पूछा, ‘तुम्हारे इस आनंद की वजह क्या है?’

किसान बोला, ‘हर दिन नारायण अपने असली रूप में मेरे सामने आते हैं। मेरे आनंद का बस यही कारण है।’ नारद ने उससे पूछा, ‘तुम कौन सी साधना करते हो?’

किसान बोला, ‘मुझे कुछ नहीं आता। मैं एक अज्ञानी, अनपढ़ आदमी हूं। बस सुबह उठने के बाद मैं तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। अपना काम शुरू करते समय मैं तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। अपना काम खत्म करने के बाद मैं फिर तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। जब मैं खाता हूं, तो तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं और जब सोने जाता हूं, तो भी तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं।’

नारद ने गिना कि वह खुद 24 घंटे में कितनी बार ‘नारायण’ बोलते हैं। वह लाखों बार ऐसा करते थे। मगर फिर भी उन्हें नारायण से मिलने के लिए वैकुण्ठ तक जाना पड़ता था, जो बहुत ही दूर था। मगर खाने, हल चलाने या बाकी कामों से पहले सिर्फ तीन बार ‘नारायण’ बोलने वाले इस किसान के सामने नारायण वहीं प्रकट हो जाते थे। नारद को लगा कि यह ठीक नहीं है, इसमें जरूर कहीं कोई त्रुटि है।

वह तुरंत वैकुण्ठ पहुंच गए और उन्होंने विष्णु से पुछा, ‘मैं हर समय आपका नाम जपता रहता हूं, मगर आप मेरे सामने प्रकट नहीं होते। मुझे आकर आपके दर्शन करने पड़ते हैं। मगर उस किसान के सामने आप रोज प्रकट होते हैं और वह परमानंद में जीवन बिता रहा है!’

विष्णु ने नारद की ओर देखा और लक्ष्मी को तेल से लबालब भरा हुआ एक बर्तन लाने को कहा। उन्होंने नारद से कहा, ‘पहले आपको एक काम करना पड़ेगा। तेल से भरे इस बर्तन को भूलोक ले जाइए। मगर इसमें से एक बूंद भी तेल छलकना नहीं चाहिए। इसे वहां छोड़कर आइए, फिर हम इस प्रश्न का जवाब देंगे।’

नारद तेल से भरा बर्तन ले कर भूलोक गए, उसे वहां छोड़ कर वापस आ गए और बोले, ‘अब मेरे प्रश्न का जवाब दीजिए।’ विष्णु ने पूछा, ‘जब आप तेल से भरा यह बर्तन लेकर जा रहे थे, तो आपने कितनी बार नारायण बोला?’

नारद बोले, ‘उस समय मैं नारायण कैसे बोल सकता था?

आपने कहा था कि एक बूंद तेल भी नहीं गिरना चाहिए, इसलिए मुझे पूरा ध्यान उस पर देना पड़ा। मगर वापस आते समय मैंने बहुत बार ‘नारायण’ कहा।’

विष्णु बोले, ‘यही आपके प्रश्न का जवाब है। उस किसान का जीवन तेल से भरा बर्तन ढोने जैसा है जो किसी भी पल छलक सकता है। उसे अपनी जीविका कमानी पड़ती है, उसे बहुत सारी चीजें करनी पड़ती हैं। मगर उसके बावजूद, वह नारायण बोलता है। जब आप इस बर्तन में तेल लेकर जा रहे थे, तो आपने एक बार भी नारायण नहीं कहा। यानी यह आसान तब होता है जब आपके पास करने के लिए कुछ नहीं होता।’

इसलिए ईश्वर कहते हैं "

जो अपने कर्म करते हुए भी मुझे याद करता है उसके द्वार पर उसके दुख हरने मैं स्वयं जाता हूँ और जो फुरसत मिलने पर मुझे याद करता है उसे दुख के समय मेरे द्वार पर आना होगा। "

🌼जय जय श्री राधे

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