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22/05/2026

चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण
ता उपर सुलतान है मत चुके चौहान ⚔️

राजपूत सम्राट पृथ्वीराज चौहान जी की जन्म जयंति के अवसर पर सादर नमन 🙏


#राजपूत_सम्राट_पृथ्वीराज_चौहान

22/05/2026

22/05/2026

झेलम के किनारे जब दो महान सेनाएं आमने-सामने आईं, तब इतिहास ने हाइडास्पीस का युद्ध दर्ज किया ⚔️🌊

326 ईसा पूर्व में राजा पोरस और सिकंदर के बीच लड़ी गई यह लड़ाई साहस, रणनीति और नेतृत्व की बड़ी मिसाल मानी जाती है।
कहा जाता है कि पोरस की वीरता और आत्मसम्मान ने खुद सिकंदर को भी प्रभावित कर दिया था। 🇮🇳🔥

यह युद्ध सिर्फ भारत और यूनानी सेनाओं की टक्कर नहीं था, बल्कि उस दौर की सैन्य शक्ति और राजधर्म की एक यादगार घटना थी।






22/05/2026

क्या आपने जयपुर के जयगढ़ किले के उस रहस्यमयी खजाने के बारे में सुना है, जिसने भारत सरकार तक को खुदाई करने पर मजबूर कर दिया था? 💰

जयपुर का अजेय जयगढ़ दुर्ग न सिर्फ अपनी मजबूत प्राचीरों के लिए, बल्कि अपने बेहतरीन प्राचीन 'जल-संरक्षण' सिस्टम के लिए भी जाना जाता है। किले के प्रांगण में बारिश का पानी सहेजने के लिए 3 विशालकाय अंडरग्राउंड 'टांके' बनाए गए थे।
लेकिन इन टांकों की कहानी सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है!

💎 गुप्त खजाने का रहस्य:
सदियों से यह किंवदंती रही है कि कछवाहा राजवंश का अकूत खजाना इन्हीं विशालकाय टांकों के नीचे बने गुप्त खुफिया कमरों में छिपाया गया था। यह खजाना इतना बड़ा बताया जाता था कि इससे पूरे राज्य की किस्मत बदल सकती थी।

🚜 1976 की ऐतिहासिक खुदाई:
खजाने की यह बात सिर्फ एक कहानी नहीं रह गई। 1976 में आपातकाल के दौरान, यह अफवाह इतनी पुख्ता मानी गई कि भारत सरकार और तत्कालीन प्रधानमंत्री को भी इस खजाने की तलाश में सेना की मदद लेनी पड़ी। जयगढ़ के इन टांकों और किले के आस-पास महीनों तक सघन खुदाई की गई!

क्या वह खजाना कभी मिला? या वह आज भी अरावली की उन मजबूत चट्टानों के नीचे कहीं दफ्न है? यह भारतीय इतिहास के सबसे दिलचस्प अनसुलझे रहस्यों में से एक है!

22/05/2026

मारवाड़ की धरा हमेशा से शूरवीरों की जननी रही है। आज कहानी कसारी गाँव (जायल) के उस वीर की, जिसने जोधपुर दरबार की आँखों में आँखें डालकर स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी।

बात उस समय की है जब जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय ने एक विदेशी बंदूक की तारीफ करते हुए कहा कि यह हाथी को मार सकती है।

तब दरबार में मौजूद जोरजी चांपावत ने निडर होकर कहा- "इसमें कौनसी बड़ी बात है, हाथी तो घास खाता है और शेर जानवर को!"
बस इसी बात पर स्वाभिमान जाग उठा।
जोरजी ने चुनौती दी कि अगर उनके पास मनपसंद घोड़ा और हथियार हो, तो पूरा मारवाड़ मिलकर भी उन्हें नहीं पकड़ सकता। और हुआ भी यही! जोरजी बागी बन गए और जोधपुर दरबार की नाक में दम कर दिया।

उनकी वीरता और चतुराई के लिए यह दोहा आज भी प्रसिद्ध है:

"चाम्पा थारी चाल औरा न आवे नी,
बावन रजवाडा लार तू हाथ ना आवेनी।"

लेकिन इतिहास गवाह है, वीरों को अक्सर अपनों ने ही चला है। इनाम के लालच में खेरवा ठाकुर (मौसी के बेटे) ने धोखे से उन्हें बुलाया। रात में सोते समय उनकी बंदूक हटा दी गई और घोड़े को बाहर कर दिया गया।

जब घोड़े की हिनहिनाहट से जोरजी की नींद खुली, तो उन्हें धोखे का अहसास हुआ। हाथ में बंदूक नहीं थी, लेकिन राजपूत का हौसला अभी भी बुलंद था। केवल एक कटारी लेकर वे शेरों की तरह लड़े।

अंतिम क्षणों में, घायल अवस्था में भी उन्होंने गद्दार खेरवा ठाकुर को मार गिराया और अपने ही रक्त से अपना पिंडदान कर वीरगति को प्राप्त हुए। जोधपुर दरबार भी उनकी मृत्यु पर रो पड़े और कहा- "ऐसे शेर को तो जिन्दा पकड़ना था!"

नमन है कसारी गाँव के इस वीर सपूत को, जिनकी छतरी आज भी जायल-खाटू संजू रोड पर उनकी वीरता की गवाही देती है।

📍 स्थान: कसारी गाँव, जायल (जोधपुर)






22/05/2026

22/05/2026

22/05/2026

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22/05/2026

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