07/08/2026
🌸 गुरु की कहानी 🌸
“हाँ, मैं केवल एक साक्षी था…”
वे वे दिन थे, जब विशालाक्षी मंडप (VM) का निर्माण पूरा होने की ओर था। उसी समय आश्रम में कई अन्य इमारतों का निर्माण भी चल रहा था।
मुझे लगभग 40 कमरों के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी और मेरे साथ करीब 100 मजदूर काम कर रहे थे। पूरे आश्रम में लगभग एक हजार लोग दिन-रात निर्माण कार्य में लगे हुए थे।
गुरुदेव हर निर्माण स्थल पर स्वयं जाते, बाहर से निरीक्षण करते और आवश्यक सुझाव व सुधार बताते। इसके बाद वे विशालाक्षी मंडप में काफी समय बिताते और वहां के अंतिम कार्यों की देखरेख करते। विशालाक्षी मंडप की कहानी पर तो एक पूरी किताब लिखी जा सकती है।
एक दिन की बात है। गुरुदेव को जर्मनी जाना था और शाम करीब 5 बजे उन्हें आश्रम से हवाई अड्डे के लिए निकलना था।
गुरुदेव हमारे निर्माण स्थल पर आए और उन्होंने मेरे इंजीनियर से पूछा कि क्या टाइल लगाने का काम पूरा हो गया है। इंजीनियर ने कहा, “जी हाँ।”
गुरुदेव उसे पहली मंजिल के एक शौचालय में ले गए। वहां केवल एक टाइल लगना बाकी थी। गुरुदेव ने कहा—
“जब तक यह आखिरी टाइल नहीं लग जाती, तब तक काम पूरा नहीं हुआ।”
हमने क्षमा मांगी।
कुछ देर बाद गुरुदेव का सामान उनकी इनोवा गाड़ी में रख दिया गया। वे गाड़ी में बैठकर हवाई अड्डे के लिए निकलने ही वाले थे कि अचानक वे पीछे हटे और बोले—
“मैं अपनी यात्रा रद्द कर रहा हूँ।”
इसके बाद उन्होंने रसोई के प्रभारी को बुलाया और कहा कि 1000 लोगों के लिए पुलाव और एक मिठाई तैयार की जाए।
खाना तैयार होने लगा। गुरुदेव ने हम सभी से कहा कि अलग-अलग निर्माण स्थलों पर काम कर रहे सभी मजदूरों को विशालाक्षी मंडप में बुलाया जाए।
यह बात फैलते ही मजदूर विशालाक्षी मंडप के सामने आने लगे। देखते ही देखते वहां मजदूरों का समुद्र-सा उमड़ पड़ा।
किसी ने सिर पर कपड़ा बांध रखा था, किसी के चेहरे और हाथों पर ग्रेनाइट की धूल थी, कोई नंगे पैर था। पुरुष और महिलाएं—सभी वहां एकत्र हो गए।
खाना तैयार हुआ और पत्तल के कटोरों में रखकर विशालाक्षी मंडप के पूर्वी द्वार के सामने, जहां नंदी विराजमान हैं, रखा गया।
अब हमें लगा कि हम सभी मिलकर मजदूरों को खाना परोसेंगे।
लेकिन जैसे ही हम आगे बढ़े, गुरुदेव ने हम सभी को पीछे हटने के लिए कहा।
वे स्वयं वीरासन में बैठ गए और एक-एक मजदूर को अपने हाथों से भोजन परोसने लगे।
हम बार-बार उनकी सहायता करने के लिए आगे बढ़ते, लेकिन गुरुदेव की एक गंभीर दृष्टि हमें चुपचाप पीछे हटने के लिए पर्याप्त होती।
भोजन परोसते हुए गुरुदेव हर मजदूर से कहते—
“चाहे कुछ भी हो जाए, खुश रहो।”
वे हर व्यक्ति की ओर देखते, मुस्कुराते और भोजन परोसते जाते।
फिर उन्होंने कहा—
“तुम मेरे आसपास इन लोगों को देख रहे हो न? जब यह विशालाक्षी मंडप पूरा हो जाएगा, तब ये लोग तुम्हें मेरे पास आने नहीं देंगे। इसलिए मैं आज ही तुम सबसे मिलने आया हूँ।”
हमने बहुत बार देखा है कि लोग दूसरों के लिए भोजन लेकर आते हैं। लेकिन उस दिन हमने अपने गुरुदेव को देखा—जो स्वयं बैठकर हर एक मजदूर को, आखिरी व्यक्ति तक, अपने हाथों से भोजन परोस रहे थे।
मैंने देखा कि कई लोगों की आंखों में आंसू थे। वे अपने आंसू पोंछ रहे थे और उस प्रसाद को बड़े प्रेम और श्रद्धा से अपने साथ ले जा रहे थे, क्योंकि वह भोजन उन्हें गुरुदेव ने स्वयं अपने हाथों से परोसा था।
वह दृश्य केवल भोजन परोसने का नहीं था।
वह प्रेम, करुणा और दूसरों के कल्याण के लिए समर्पण का अद्भुत दृश्य था।
जब गुरुदेव कहते हैं—
“मैं तुम्हें रास्ता नहीं दिखाऊंगा, बल्कि तुम्हें मंजिल तक ले जाऊंगा,”
तो वे इसे सचमुच अपने जीवन में निभाते हैं।
जब वे कहते हैं—
“अपनी सारी चिंताएं यहां आश्रम में छोड़कर जाओ और प्रसन्न होकर जाओ,”
तो वे सच में चाहते हैं कि हम अपनी चिंताएं वहीं छोड़ दें और हल्के मन से वापस जाएं।
और जब वे कहते हैं—
“या तो तुम चिंता करो, या जीवन में गुरु रखो,”
तो उनका अर्थ यही है कि अपनी चिंताओं और समस्याओं को वहीं छोड़ देना चाहिए। उन्हें विश्वास है कि गुरु अपने शिष्यों और उनके जीवन की आवश्यकताओं का ध्यान रखने में सक्षम हैं।
उस शाम कोई सत्संग नहीं हुआ।
लगभग तीन घंटे तक गुरुदेव स्वयं एक-एक मजदूर को भोजन परोसते रहे, और हम सभी बस उस अद्भुत दृश्य के साक्षी बने रहे।
हाँ…
हम केवल साक्षी थे—उस प्रेम और करुणा के, जो गुरुदेव के हृदय में इस धरती के प्रत्येक प्राणी के लिए है।
🙏💕🙏
एक भक्त द्वारा साझा की गई घटना।
Forwarded as received.🙏🏻