29/08/2026
तम का जहाँलेश नहीं, क्लेश नहीं,
द्वेष नहीं।
काम नहीं, क्रोध नहीं, लोभ नहीं,
मोह नहीं।
भाव हैप्रधान जहाँ,
छल का तो प्रवेश नहीं।
येवि षय नहींशोध का,
हैवि षय आत्मबोध का,
तो भजो, भजो, भजो, भजो, भजो,
भजो जि नको भजतेहैं,
स्वयंत्रि परुारि ।