21/10/2023
इस दृश्य में श्री राम द्वारा बालि को तीर मारने का अंकन है। यह पापनाथ मंदिर कर्नाटक से प्राप्त हुआ है। इस फलक के ऊपर उत्तरोत्तर गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि में "सुग्रीव" शब्द लिखा भी प्राप्त हुआ है। यह दृश्यांकन बाल्मिकी रामायण के सुग्रीव एवं बालि युद्ध प्रसंग को दर्शाता हुआ प्रतीत हो रहा है।जिसमें श्रीराम द्वारा बालि को अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी को बंधक बनाकर रखने के कारण बध करने का अंकन है।
This scene depicts Shri Ram shooting an arrow at Bali. This Papnath temple has been obtained from Karnataka. The word "Sugriva" has also been found written on this panel in Brahmi script of late Gupta period. This visualization seems to be depicting the war between Sugriva and Bali of Valmiki Ramayana, in which Shri Ram is depicted killing Bali for keeping his younger brother Sugriva's wife hostage.
संदर्भ - भारत में दरबारी संस्कृति और दृश्य कला: छठी से आठवीं शताब्दी के हिंदू मंदिरों पर रामायण राहतें, चित्र। 47, पेज नं. 201
Reference - Courtly Culture and Visual art in India: Ramayana Reliefs on hindu temples of the sixth to eight century, fig. 47, page no. 201
Sanatan Samiksha #कुशवाहा #हिन्दू #बुद्ध
20/10/2023
यह फलक गुप्त कालीन 5-6 इस्वी के है। यह एशियन आर्ट संग्रहालय, यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को में संरक्षित है। इसमें रावण पुष्पक विमान में सीताजी को अपहरण करते हुए दर्शाया गया है तथा जटायु नामक पक्षी रावण से सीता जी की रक्षा हेतु युद्ध कर रहा है।यह घटनाक्रम बाल्मिकी रामायण से संबंधित है
This panel belongs to the Gupta period, 5-6 AD. It is preserved in the Asian Art Museum, San Francisco, United States of America. In this, Ravana is shown Kidnapping Sita in Pushpak plane and a bird named Jatayu is fighting to protect Sita from Ravana.
This incident is related to Valmiki Ramayan
संदर्भ-ईंट फाउंडेशन: उत्तर भारतीय ईंट मंदिर वास्तुकला और चौथी से छह शताब्दी ईस्वी की टेराकोटा कला, अंजीर। 8.4, पृष्ठ नं. 280
Reference -Brick Foundation: North Indian Brick Temple Architecture and Terracotta Art Of the Fourth to Six Centuries CE , fig. 8.4, Page no. 280
Sanatan Samiksha #कुशवाहा #बुद्ध #हिन्दू
19/03/2022
❣️फ्योंली ज्वान ह्वेगे🥰❣️
देवभूमि उत्तराखण्ड में बसंत ऋतु के आगमन के साथ देवभूमि फ्योंली के फूलों की चादर ओढ़ लेती है। इसे Yellow flax और गोल्डल गर्ल भी कहते हैं। फ्योंली एक ऐसा फूल है जो पहाड़ की लोक संस्कृति में रचा-बसा है। यहां के लोक कवियों और गायकों ने इसे अपनी रचनाओं में उकेरा ही नहीं बल्कि इसे खुद में जिया भी है।
उत्तराखंड के कई लेखकों और कवियों का कहना है कि पहाड़ों में फ्योंली का खिलना वसन्त के आने की सूचना देता है तो कवियों के लिए उनकी रचना का विषय भी देता है। जिसकी सुन्दरता से कवि अपनी कविता की रचना करते हैं। गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी द्वारा गाया गया बेहद लोकप्रिय गढ़वाली लोकगीत..
"हे जी सार्यूं मा फूली गे होली फ्योंली लयड़ि, मै घौर छोड़ि आवा।"
हेजी घर बौंण बौड़ी गे होलु बालु बसंत मै घौर छोड़ि आवा।आज जब भी सुनाई देता है तो मन में वसंत ऋतु की सुन्दर छवि उभर आती है।
दरअसल फ्योंली के बारे में उत्तराखंड की लोक कथाओं में कहा जाता है कि देवगढ़ के राजा की एकलौती पुत्री का नाम फ्योंली था जो अत्यधिक सुन्दर व गुणवान थी, लेकिन उसकी असामयिक मृत्यु हो गई थी। राजमहल के जिस कोने पर राजकुमारी की याद में राजा द्वारा स्मारक बनाया गया था उस स्थान पर पीले रंग का यह फूल खिला जिसका नाम फ्योंली रखा गया।
आज भी फ्योंली शब्द देवभूमि से दूर रह रहे उत्तराखंडियों को भावुक कर देता है। पहाड़ों में बसन्त के आगमन का संदेश लाने वाली फ्योंली वसन्त ऋतु में प्रफुल्लित हो जीवन में उल्लास और प्रेम का संदेश देती है।
24/01/2022
हा कृष्ण! द्वारकावासिन्! क्वासि यादवनन्दन! ।
इमामवस्थां सम्प्राप्तां अनाथां किमुपेक्षसे ॥
22/11/2021
(ऋषिकेश नारायण भरत मंदिर)
स्कन्द पुराण केदार खण्ड के अन्तर्गत इस प्राचीन मन्दिर का वर्णन इस प्रकार से है ।
कृते वाराहरुपेण त्रेतायां कृतवीर्यजम् ।
द्वापरे वामनं देवं कलौ भरतमेव च ।
(स्कन्द पुराण 116/42)
यहाँ पर रैभ्य ऋषि एवं सोमशर्मा की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनको दर्शन दिये और उनके आग्रह पर अपनी माया के दर्शन कराये। ऋषि ने माया के दर्शन कर भगवान से प्रार्थना की, प्रभु आप माया से मुक्ति प्रदान करें। भगवान विष्णु ने तब वरदान दिया कि आपने इन्द्रियों (हृषीक) को वश में करके मेरी आराधना की है, इसलिये यह स्थान हृषीकेश कहलायेगा और मैं कलियुग में भरत नाम से विराजूंगा। हृषीकेश के मायाकुण्ड में पवित्र स्थान के बाद जो प्राणी मेरे दर्शन करेगा उसे माया से मुक्ति मिल जायेगी। ये ही हृषीकेश भगवान श्री भरत जी महाराज हैं।
विक्रमी सम्वत् 846 (ई0 सन् 789) के लगभग आद्य शंकराचार्य जी ने बसंत पंचमी के दिन हृषीकेश नारायण श्री भरत भगवान की मूर्ति को मन्दिर में पुनः प्रतिष्ठित करवाया। यह मूर्ति शालिग्राम शिला पर निर्मित है। तभी से हर वर्ष बसन्त - पंचमी के दिन भगवान शालिग्राम जी को हर्ष उल्लास से मायाकुण्ड में पवित्र स्नान के लिये ले जाया जाता है एवं धूमधाम से नगर भ्रमण के बाद पुनः मन्दिर में आकर प्रतीकात्मक प्रतिष्ठित किया जाता है।
31/05/2021
दारुहल्दी -किनगोड़🍇
'दारू हल्दी जिसे स्थानीय भाषा में किनगोड़ कहा जाता है, एक जबरदस्त एंटी डायबेटिक पौधा है। साथ ही इसमें अन्य औषधीय गुण भी है। इसका संस्कृत नाम दारुहरिद्रा,हिन्दी नाम दारुहल्दी तथा अन्य नाम किनगोड़, तोतर वा किलमोड़ा है
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल के पारंपरिक खानपान में जितनी विविधता एवं विशिष्टता है, उतनी ही यहां के फल-फूलों में भी है। खासकर जंगली फलों का तो यहां समृद्ध दुनिया है। यह फल कभी मुसाफिरों व चरवाहों की क्षुधा शांत किया करते थे। लेकिन धीरे-धीरे लोगों को इनका महत्व समझ में आया तो लोक ज़िंदगी का भाग बन गए। औषधीय गुणों से भरपूर जंगली फलों का लाजवाब जायका हर किसी को इनका दीवाना बना देता है।
उत्तराखंड में जंगली फल न केवल स्वाद, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद अहमियत रखते हैं। बेडू, तिमला, मेलू, काफल, अमेस, दाड़िम, करौंदा, बेर, जंगली आंवला, खुबानी, हिंसर, किनगोड़, खैणु, तूंग, खड़ीक, भीमल, आमड़ा, कीमू, गूलर, भमोरा, भिनु समेत जंगली फलों की ऐसी सौ से ज्यादा प्रजातियां हैं,जो पहाड़ को प्राकृतिक रूप में संपन्नता प्रदान करती हैं। इन जंगली फलों में विटामिन्स व एंटी ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इन जंगली फलों में एक फल है किनगोड़।
किनगोड़ उत्तराखंड के 1400 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर मिलने वाला एक औषधीय प्रजाति है। इसका बॉटनिकल नाम ‘बरबरिस अरिस्टाटा’ है। किनगोड़ से अब एंटी डायबिटिक दवा तैयार की जा रही है।
इसका पौधा दो से तीन मीटर ऊंचा होता है। पहाड़ में पायी जाने वाली कंटीली झाड़ी किनगोड़ आमतौर पर खेतों की बाड़ के लिए प्रयोग होती है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह औषधीय गुणों से भी भरपूर है। मधुमेह में किल्मोड़ा की जड़ बेहद कारगर होती है। इसके अलावा बुखार, पीलिया और नेत्र आदि रोगों के इलाज में भी ये फायदेमंद है।
इस पौधे की होम्योपैथी में बरबरिस नाम से दवा बनाई जाती है। इस पौधे की जड़ से अल्कोहल ड्रिंक बनता है। इसके अलावा कपड़ों के रंगने में इसका इस्तेमाल होता है। यह प्रजाति भारत के उत्तराखंड-हिमांचल के अलावा नेपाल और श्रीलंका में भी पाई जाती है।
किनगौड़ की जड़ों को पानी में भिगोकर रोज सुबह पीने से शुगर के रोग से बेहतर ढंग से लड़ा जा सकता है। फलों का सेवन मूत्र संबंधी बीमारियों से निजात दिलाता है। इसके फलों में मौजूद विटामीन सी त्वचा रोगों के लिए भी फायदेमंद है।
उत्तराखंड के जंगलों में यह बहुतायत में पाया जाता है। कई लोग इसके कंटीली झाड़ी से खेतों पर बाड़ लगाते हैं, इसका फल बहुत ही टेंगी होता है। इसे सभी पसंद करते हैं, इसकी औषधीय गुणवता की जानकारी ना होने की वजह से लोग इसका पर्याप्त फायदा नहीं उठा पाते हैं। लेकिन ध्यान यह रखें कि इसके प्रयोग से पहले इसकी प्रयोग की विधि किसी जानकार व्यक्ति से अवश्य लें। तभी ही इस औषधि का सेवन करें।_yogi uttarakhandi
31/05/2021
दारुहल्दी -किनगोड़🍇
'दारू हल्दी जिसे स्थानीय भाषा में किनगोड़ कहा जाता है, एक जबरदस्त एंटी डायबेटिक पौधा है। साथ ही इसमें अन्य औषधीय गुण भी है। इसका संस्कृत नाम दारुहरिद्रा,हिन्दी नाम दारुहल्दी तथा अन्य नाम किनगोड़, तोतर वा किलमोड़ा है
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल के पारंपरिक खानपान में जितनी विविधता एवं विशिष्टता है, उतनी ही यहां के फल-फूलों में भी है। खासकर जंगली फलों का तो यहां समृद्ध दुनिया है। यह फल कभी मुसाफिरों व चरवाहों की क्षुधा शांत किया करते थे। लेकिन धीरे-धीरे लोगों को इनका महत्व समझ में आया तो लोक ज़िंदगी का भाग बन गए। औषधीय गुणों से भरपूर जंगली फलों का लाजवाब जायका हर किसी को इनका दीवाना बना देता है।
उत्तराखंड में जंगली फल न केवल स्वाद, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद अहमियत रखते हैं। बेडू, तिमला, मेलू, काफल, अमेस, दाड़िम, करौंदा, बेर, जंगली आंवला, खुबानी, हिंसर, किनगोड़, खैणु, तूंग, खड़ीक, भीमल, आमड़ा, कीमू, गूलर, भमोरा, भिनु समेत जंगली फलों की ऐसी सौ से ज्यादा प्रजातियां हैं,जो पहाड़ को प्राकृतिक रूप में संपन्नता प्रदान करती हैं। इन जंगली फलों में विटामिन्स व एंटी ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इन जंगली फलों में एक फल है किनगोड़।
किनगोड़ उत्तराखंड के 1400 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर मिलने वाला एक औषधीय प्रजाति है। इसका बॉटनिकल नाम ‘बरबरिस अरिस्टाटा’ है। किनगोड़ से अब एंटी डायबिटिक दवा तैयार की जा रही है।
इसका पौधा दो से तीन मीटर ऊंचा होता है। पहाड़ में पायी जाने वाली कंटीली झाड़ी किनगोड़ आमतौर पर खेतों की बाड़ के लिए प्रयोग होती है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह औषधीय गुणों से भी भरपूर है। मधुमेह में किल्मोड़ा की जड़ बेहद कारगर होती है। इसके अलावा बुखार, पीलिया और नेत्र आदि रोगों के इलाज में भी ये फायदेमंद है।
इस पौधे की होम्योपैथी में बरबरिस नाम से दवा बनाई जाती है। इस पौधे की जड़ से अल्कोहल ड्रिंक बनता है। इसके अलावा कपड़ों के रंगने में इसका इस्तेमाल होता है। यह प्रजाति भारत के उत्तराखंड-हिमांचल के अलावा नेपाल और श्रीलंका में भी पाई जाती है।
किनगौड़ की जड़ों को पानी में भिगोकर रोज सुबह पीने से शुगर के रोग से बेहतर ढंग से लड़ा जा सकता है। फलों का सेवन मूत्र संबंधी बीमारियों से निजात दिलाता है। इसके फलों में मौजूद विटामीन सी त्वचा रोगों के लिए भी फायदेमंद है।
उत्तराखंड के जंगलों में यह बहुतायत में पाया जाता है। कई लोग इसके कंटीली झाड़ी से खेतों पर बाड़ लगाते हैं, इसका फल बहुत ही टेंगी होता है। इसे सभी पसंद करते हैं, इसकी औषधीय गुणवता की जानकारी ना होने की वजह से लोग इसका पर्याप्त फायदा नहीं उठा पाते हैं। लेकिन ध्यान यह रखें कि इसके प्रयोग से पहले इसकी प्रयोग की विधि किसी जानकार व्यक्ति से अवश्य लें। तभी ही इस औषधि का सेवन करें।_yogi uttarakhandi